इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह दिवंगत वकीलों के आश्रितों को दिए जाने वाले मुआवज़े की राशि बढ़ाने पर विचार करे [ज्योतिमा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य]।
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस गरिमा प्रसाद की डिवीज़न बेंच ने गौर किया कि 'वकीलों के लिए वित्तीय सहायता योजना' के तहत मुआवज़े की रकम 2015 में ₹5 लाख तय की गई थी और तब से, इस योजना का फंड ₹20 करोड़ से बढ़कर ₹330 करोड़ हो गया है।
हालांकि, कोर्ट ने देखा कि मुआवज़े की रकम अभी भी ₹5 लाख ही है। इसलिए, कोर्ट ने सरकार से मुआवज़े की रकम बढ़ाने पर विचार करने को कहा।
कोर्ट ने निर्देश दिया, "सरकार एक हलफनामा (affidavit) पेश करे कि वह वित्तीय सहायता योजना के तहत मुआवज़े की रकम में कितनी बढ़ोतरी करने का प्रस्ताव रखती है; हम यह फैसला राज्य सरकार की समझदारी पर छोड़ते हैं। अगर अगली तारीख तक इस मामले में सही हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो कोर्ट को इस मामले पर सख़्त रुख अपनाना पड़ेगा।"
कोर्ट एक वकील की विधवा की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने ₹5 लाख के मुआवज़े के लिए अपनी अर्ज़ी पर फ़ैसला होने में हुई देरी के कारण ब्याज की मांग की थी। उन्होंने 2020 में मुआवज़े के लिए अर्ज़ी दी थी, लेकिन भुगतान 2025 में हुआ।
7 जुलाई को कोर्ट ने इस देरी को गंभीरता से लिया और उत्तर प्रदेश एडवोकेट वेलफ़ेयर फ़ंड ट्रस्टी सोसाइटी, लखनऊ (ट्रस्ट) के सदस्य सचिव को निर्देश दिया कि वे दिवंगत वकीलों के ज़रूरतमंद और पात्र आश्रितों को मुआवज़ा देने में हुई देरी के बारे में बताएं।
जवाब में, कोर्ट को बताया गया कि इस स्कीम के तहत अर्ज़ियां उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के ज़रिए भेजी जाती हैं और संबंधित गाइडलाइंस का पालन न होने के कारण, अर्ज़ियां या तो वहीं पेंडिंग रह जाती हैं या फिर आगे की जांच और ज़रूरी प्रक्रियाओं के लिए स्टेट बार काउंसिल को वापस भेज दी जाती हैं।
अभी, ऐसी कमियों की वजह से 1,207 अर्ज़ियां पेंडिंग हैं।
कोर्ट ने ऐसी अर्ज़ियों की जांच में देरी करने के लिए बार काउंसिल की आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि काउंसिल के पास पहले से ही रजिस्टर्ड वकीलों की लिस्ट होती है और जब कोई आश्रित मुआवज़े के लिए अर्ज़ी देता है, तो काउंसिल को सभी ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स के साथ सभी फ़ॉर्म ठीक से भरवाकर ही उन्हें भुगतान के लिए ट्रस्ट को भेजना चाहिए।
बेंच ने कहा, "हमें यह समझ नहीं आता कि बार काउंसिल ट्रस्ट को अधूरी जानकारी वाली अर्ज़ियां क्यों भेजती है या ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स न होने के कारण अधूरी अर्ज़ियां क्यों आगे बढ़ाती है, जिससे अर्ज़ियों पर फ़ैसला होने में देरी होती है।"
कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वह भविष्य में दिवंगत वकीलों के आश्रितों की अर्ज़ियों को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए प्रस्तावित गाइडलाइंस पर एक हलफ़नामा दाखिल करे।
कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रस्ट वकीलों के आश्रितों को मुआवज़ा देने के लिए केवल अपने कॉर्पस (मूल फ़ंड) से मिले ब्याज का इस्तेमाल कर रहा था।
कोर्ट ने पाया कि इसके कारण अर्ज़ियों पर फ़ैसला होने में देरी हो रही थी। कोर्ट ने कहा कि हो सकता है कि ब्याज ट्रस्ट की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफ़ी न हो।
कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट को या तो पात्र आवेदकों को मुआवज़ा देने के लिए अपने मूल कॉर्पस का इस्तेमाल शुरू करना होगा या फिर राज्य से आर्थिक मदद लेनी होगी।
आर्थिक स्थिति को देखते हुए, कोर्ट ने ट्रस्ट को निर्देश दिया कि वह अगले 30 दिनों के भीतर राज्य सरकार से और आर्थिक मदद ले। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार पेमेंट में देरी करती है, तो ट्रस्ट बिना किसी अनावश्यक देरी के मुआवज़ा देने के लिए कॉर्पस की फिक्स्ड डिपॉज़िट को भुना सकता है।
बेंच ने कहा, "हमें उम्मीद है कि राज्य सरकार ट्रस्ट को ज़रूरी आर्थिक मदद देने के मामले में व्यावहारिक रुख अपनाएगी।"
इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से वकील कुआर सिंह पेश हुए।
राज्य की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल एमसी चतुर्वेदी और एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल पीके शाही पेश हुए।
अन्य प्रतिवादियों की ओर से वकील अभिषेक श्रीवास्तव और अशोक कुमार तिवारी पेश हुए।
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