बॉम्बे हाईकोर्ट ने गुरुवार को गोवा सरकार की उस अपील पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें 2013 के यौन उत्पीड़न मामले में तहलका के पूर्व एडिटर तरुण तेजपाल को बरी किए जाने को चुनौती दी गई थी [गोवा राज्य बनाम तरुणजीत तेजपाल और अन्य]।
जस्टिस नीला गोखले और अमित जमसांडेकर की डिवीज़न बेंच ने अपील पर सुनवाई सात सत्रों में पूरी की और फिर याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया।
सुनवाई के दौरान, राज्य ने आरोप लगाया कि ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला गलत और पूर्वाग्रह से प्रेरित था। तेजपाल का कहना था कि बरी करने का फ़ैसला रिकॉर्ड को ध्यान से पढ़ने के बाद लिया गया था, जिसमें CCTV फ़ुटेज, मैसेज और एक्सपर्ट के सबूत शामिल थे।
गोवा राज्य की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने हाईकोर्ट को बताया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी के व्यवहार का आकलन करने के बजाय, असल में शिकायतकर्ता का ही ट्रायल शुरू कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि ट्रायल जज ने शिकायतकर्ता की निजी ज़िंदगी, घटना के बाद भेजे गए मैसेज और आम तौर पर अपेक्षित व्यवहार (normative behaviour) को आधार बनाया था। उन्होंने कहा कि यह फ़ैसला मनमानेपन का एक बेहतरीन उदाहरण है, जिसमें निष्कर्षों को न तो कानून का और न ही सबूतों का समर्थन हासिल है, और शिकायतकर्ता की गवाही को भी चुनिंदा तरीके से पढ़ा गया है।
सीनियर वकील आबाद पोंडा ने दलील दी कि बरी करने का फ़ैसला सही था क्योंकि शिकायत करने वाले के बयान का खंडन CCTV फ़ुटेज, पंचनामा की सामग्री और होटल की लिफ़्ट के काम करने के तरीके से जुड़े एक्सपर्ट के सबूतों से हो रहा था। उन्होंने दावा किया कि शिकायत निजी और पेशेवर असंतोष से जुड़ी थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह आपराधिक मामला शिकायत करने वाले की अपनी पहल के बजाय मीडिया और संस्थागत दबाव के कारण चलाया गया था।
मेहता को महाधिवक्ता देवीदास पंगम और लोक अभियोजक शैलेन्द्र भोबे और प्रवीण फल्देसाई ने सहायता प्रदान की।
पोंडा की सहायता अधिवक्ता सुभाष जाधव और रौनक राव ने की।
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