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बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति की आय के अंदाज़े पर आधारित गुज़ारा-भत्ते के आदेश को रद्द कर दिया

कोर्ट ने फ़ैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह 6 महीने के अंदर मामले पर नए सिरे से फ़ैसला करे। कोर्ट ने बच्चे के भरण-पोषण की राशि को फ़िलहाल वैसा ही बनाए रखा।

Bar & Bench

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में पुणे की फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक महिला को उसके अलग रह रहे पति की आय के बारे में सिर्फ़ "अंदाज़े" के आधार पर फ़ैमिली कोर्ट द्वारा ₹10 लाख का स्थायी गुज़ारा-भत्ता (एलिमनी) देने का फ़ैसला किया गया था।

आय की सही जानकारी न होने पर, फ़ैमिली कोर्ट के जज ने मान लिया था कि पति हर महीने ₹1 लाख कमाता है, क्योंकि वह एक स्किल्ड और क्वालिफ़ाइड व्यक्ति था और पहले जर्मनी में काम कर चुका था।

जस्टिस भारती डांगरे और आशीष एस. चव्हाण की डिवीज़न बेंच ने इस तरीके पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि फ़ैमिली कोर्ट के जज ने बिना किसी सबूत के ऐसा अंदाज़ा लगाया था।

हाईकोर्ट ने कहा, "जज ने बिना किसी सबूत के सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया कि पति की कमाई कितनी है और पत्नी की ज़रूरतें क्या हैं।"

Justices Bharati Dangre and Ashish S Chavan

इसलिए, हाईकोर्ट ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए फैमिली कोर्ट में वापस भेज दिया।

कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के जज को निर्देश दिया कि वे पति की कमाई और पत्नी की ज़रूरतों का हिसाब लगाकर स्थायी गुजारा-भत्ता (permanent alimony) की रकम तय करें।

कोर्ट ने आदेश दिया, "हमें मामले को पुणे के फैमिली कोर्ट के जज के पास वापस भेजना सही लगता है ताकि वे स्थायी गुजारा-भत्ते और बेटी के लिए दिए जाने वाले भरण-पोषण (maintenance) की रकम तय कर सकें। यह रकम अपील करने वाले पति की कमाई के हिसाब से होनी चाहिए, क्योंकि जज ने बिना किसी सबूत के सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया था कि पति की कमाई कितनी है और पत्नी की ज़रूरतें क्या हैं।"

पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए फैमिली कोर्ट में अर्ज़ी दी थी। पत्नी ने मामले में अपना पक्ष नहीं रखा था। कोर्ट ने शादी खत्म कर दी थी और पति को स्थायी गुजारा-भत्ते के तौर पर ₹10 लाख देने का आदेश दिया था। साथ ही, बच्चे के भरण-पोषण के लिए ₹10,000 प्रति माह देने का भी आदेश दिया था।

पति ने इन आर्थिक आदेशों को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अर्ज़ी दायर की। उसने इस बात पर आपत्ति जताई कि फैमिली कोर्ट ने उसकी कमाई का अंदाज़ा किस तरह लगाया था।

फैमिली कोर्ट ने कहा था, "जानकारी न होने पर यह माना जा सकता है कि याचिकाकर्ता की नेट इनकम ₹1 लाख प्रति माह होगी।"

हाईकोर्ट की बेंच को यह तरीका मंज़ूर नहीं था। उसने कहा कि स्थायी गुजारा-भत्ता और भरण-पोषण की रकम पति की असल कमाई के हिसाब से होनी चाहिए।

नतीजतन, हाईकोर्ट ने मामले को पुणे फैमिली कोर्ट में वापस भेज दिया।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को आदेश दिया कि वह छह महीने के भीतर मामले पर नए सिरे से फ़ैसला करे। तब तक, पति को बच्चे के भरण-पोषण के लिए ₹10,000 प्रति माह देना जारी रखना होगा।

पति की ओर से वकील अश्विन पिंपले पेश हुए।

पत्नी की ओर से वकील अमतुज़ेहरा चिमथानावाला पेश हुईं।

[आदेश पढ़ें]

Bombay_High_Court_order___August_28.pdf
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Bombay High Court sets aside alimony order issued based on guesswork of husband's income