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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पति को तलाक के मामले में सबूत के तौर पर कॉल रिकॉर्डिंग, वॉट्सऐप चैट इस्तेमाल करने की इजाज़त दी

कोर्ट ने कहा, "मुकदमा लड़ने वाली पार्टी को ज़रूर प्राइवेसी का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार दूसरी पार्टी के अधिकार के आगे झुकना चाहिए, ताकि वह अपना केस साबित करने के लिए कोर्ट में ज़रूरी सबूत ला सके।"

Bar & Bench

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में एक फैमिली कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें तलाक के एक मामले में पति द्वारा सबूत के तौर पर पेश की गई कॉल रिकॉर्डिंग और WhatsApp चैट को अनुमति दी गई थी।

जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने कहा कि फैमिली कोर्ट्स एक्ट का सेक्शन 14 किसी भी सबूत की मंज़ूरी के बारे में आम नियम में एक छूट देता है और फैमिली कोर्ट को ऐसे सबूतों पर विचार करने की इजाज़त देता है जो किसी झगड़े को असरदार तरीके से निपटाने के लिए ज़रूरी हैं।

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर प्राइवेसी के उल्लंघन पर आधारित किसी आपत्ति के आधार पर ऐसे किसी सबूत को बाहर रखा जाता है, तो यह नियम बेकार हो जाएगा।

बेंच ने आगे कहा, “इसलिए यह आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फैमिली कोर्ट के सामने आने वाले ज़्यादातर मामलों में, जिन सबूतों को पेश करने की कोशिश की जा रही है, वे केस करने वाली पार्टियों के निजी मामलों से जुड़े होंगे। अगर सेक्शन 14 को ऐसे सबूतों पर पूरी तरह लागू नहीं माना जाता है जो किसी व्यक्ति के प्राइवेसी के अधिकार पर असर डालते हैं, तो न केवल सेक्शन 14 बल्कि फैमिली कोर्ट बनाने का मकसद ही बेमतलब हो सकता है। इसलिए, मंज़ूरी का टेस्ट सिर्फ़ उसकी अहमियत होगी।”

Justice Sachin Singh Rajput

यह फ़ैसला 11 फरवरी को पत्नी की अपील पर सुनाया गया, जिसमें उसने फ़ैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसके पति की ऑडियो बातचीत और WhatsApp चैट को रिकॉर्ड पर लाने की अर्ज़ी को मंज़ूरी दी गई थी।

उसने आरोप लगाया कि उसके पति ने उसका मोबाइल फ़ोन हैक करने के बाद सबूत रिकॉर्ड पर लाए थे। कोर्ट को बताया गया कि उसके पति की हरकतों से उसकी प्राइवेसी के अधिकार का उल्लंघन हुआ।

हालांकि, बेंच ने कहा कि हालांकि प्राइवेसी के अधिकार को एक बुनियादी अधिकार माना गया है, लेकिन यह पूरी तरह से लागू नहीं है और इसमें कुछ छूट, सीमाएं और ज़रूरी पाबंदियां हैं।

इसमें आगे कहा गया, “मुकदमा लड़ने वाली पार्टी को निश्चित रूप से प्राइवेसी का अधिकार है, लेकिन उस अधिकार को दूसरी पार्टी के अधिकार के आगे झुकना चाहिए, ताकि वह अपना केस साबित करने के लिए कोर्ट में ज़रूरी सबूत ला सके। यह निष्पक्ष सुनवाई का एक तय कॉन्सेप्ट है कि मुकदमा लड़ने वाली पार्टी को कोर्ट के सामने ज़रूरी सबूत लाने का सही मौका मिले।”

इस तरह, कोर्ट ने अपील खारिज कर दी।

वकील हेमंत केशरवानी और स्वप्निल केशरी ने पत्नी की तरफ़ से केस लड़ा।

वकील बीपी शर्मा और पुष्प गुप्ता ने पति की तरफ़ से केस लड़ा।

[फैसला पढ़ें]

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Chhattisgarh High Court allows husband to use call recordings, WhatsApp chats as evidence in divorce case