सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए एक कमेटी बनाएगा। इस कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज, हाई कोर्ट के एक पूर्व चीफ जस्टिस और पुलिस के एक सीनियर रिटायर्ड अधिकारी शामिल होंगे। कमेटी पुलिस की ज्यादतियों और पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा जैसे मामलों की जांच करेगी।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि हाई-पावर वाली कमेटी को तथ्यों का पता लगाने का काम सौंपा जाएगा और उससे समय-समय पर रिपोर्ट मांगी जाएगी ताकि कोर्ट ज़रूरी निर्देश दे सके।
बेंच ने कहा, "हम कमेटी को सभी ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर सुविधाएं देंगे। हमें पूरा भरोसा है कि कमेटी उसके पास आने वाले किसी भी पीड़ित की बात तुरंत सुनेगी और उन्हें अपनी बात रखने का मौका देगी। हम कमेटी की समय-समय पर आने वाली सिफारिशों का इंतज़ार करेंगे और उसके बाद ज़रूरी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि कमेटी महिला प्रदर्शनकारियों के साथ यौन उत्पीड़न और ऑनलाइन उत्पीड़न, और सोशल मीडिया के ज़रिए कमज़ोर लोगों को परेशान करने के आरोपों की जांच करेगी।
CJI कांत ने कहा, "जो भी इसके लिए ज़िम्मेदार है, उसके लिए कोई बहाना या कोई सफाई नहीं चलेगी। इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए और मामले को तार्किक अंजाम तक पहुंचाया जाना चाहिए। इसीलिए हम एक हाई-पावर कमेटी बना रहे हैं। कमेटी इन मामलों के हर पहलू की जांच करेगी।"
कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था जो NEET और दूसरी परीक्षाओं के पेपर लीक होने के आरोपों को लेकर जंतर-मंतर, बिहार और देश के दूसरे हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी थीं।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं से कहा जाएगा कि वे या तो सीधे कमेटी से संपर्क करें या फिर जो मुद्दे वे उठा रहे हैं, उन्हें कोर्ट के सामने रखें।
हालांकि, बेंच ने कहा कि फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी, सर्विलांस और प्राइवेसी से जुड़े संवैधानिक सवालों पर आखिरी फैसला खुद कोर्ट ही करेगा, न कि कमेटी।
कोर्ट ने कहा, "कमेटी तथ्यात्मक सवालों की जांच कर सकती है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या बल का अत्यधिक प्रयोग किया गया था। कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर, फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी से जुड़े बड़े कानूनी और संवैधानिक सवालों पर यह कोर्ट विचार करेगा।"
आज कोर्ट ने यह भी कहा कि वह छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने के लिए आर्टिकल 142 (सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण न्याय करने की असाधारण शक्ति) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने पर विचार करेगा, लेकिन गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों से जुड़े मामलों को अलग से देखा जा सकता है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता इस बात से सहमत थे कि छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR रद्द की जानी चाहिए। हालांकि, उन्होंने कहा कि गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोग भी विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो गए थे और उनकी जांच होनी चाहिए।
यह बताया गया कि 2,873 लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड गंभीर पाया गया, जिनमें हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, रेप और POCSO (बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण) एक्ट के तहत अपराधों के आरोप शामिल हैं।
CJI कांत ने कहा कि राज्य सरकारें उन FIR की लिस्ट सौंप सकती हैं जिनमें सिर्फ छात्र शामिल हैं।
कोर्ट ने कहा, "इस कोर्ट की शक्तियों के बारे में कानून स्पष्ट है और हम उस शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हैं। जिन लोगों के बारे में आप कह रहे हैं कि उनका आपराधिक रिकॉर्ड है, उनसे जुड़ी FIR के मामले में हमने पिछली बार उस शब्द को स्पष्ट किया था।"
यह उनके जीवन और भविष्य से जुड़ा सवाल है। उनके माता-पिता उनकी पढ़ाई पर अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर रहे हैं। उन्हें अपना भविष्य जीना है। सिस्टम से उनकी जायज़ उम्मीदें हैं।सुप्रीम कोर्ट
प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करने वाले याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने कहा कि उन्होंने गैर-कानूनी तरीके से संसद तक मार्च करने की कोशिश की थी। कोर्ट ने कहा कि अपराध की बात तय करने के लिए यह देखना होगा कि छात्र किस मकसद और उद्देश्य से इकट्ठा हुए थे।
CJI कांत ने आगे कहा, "हमें आर्टिकल 19 के तहत उनके अधिकारों को नहीं भूलना चाहिए। जब तक कानून तोड़ने का कोई इरादा न हो और मकसद शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से विरोध करना हो, ताकि वे अपनी कुछ मांगों को अधिकारियों के सामने रख सकें और उम्मीद कर सकें कि अधिकारी उन पर विचार करेंगे, तब तक ऐसे मामलों को उन मामलों से बिल्कुल अलग माना जाना चाहिए जिनमें पक्के अपराधी ऐसी शांतिपूर्ण भीड़ में घुसकर हिंसा करते हैं।"
जब वकील ने कहा कि कोर्ट की नरमी को उसकी कमज़ोरी के तौर पर देखा जा सकता है, तो CJI कांत ने कहा,
"हम भावनात्मक पहलू पर बात नहीं कर रहे हैं। यह उनके जीवन और भविष्य से जुड़ा सवाल है। उनके माता-पिता उनकी पढ़ाई पर अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर रहे हैं। उन्हें अपना भविष्य जीना है। सिस्टम से उनकी जायज़ उम्मीदें हैं।"
इस मामले में सीनियर वकील एन. हरिहरन, मेनका गुरुस्वामी, गोपाल शंकरनारायणन और शादान फ़रासत पेश हुए। वकील वृंदा ग्रोवर और रिज़वान अहमद ने भी अपनी बात रखी।
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