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न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता: जजों की सुरक्षा के मामले में दिल्ली पुलिस को दिल्ली हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सात दिनों के भीतर एक और बैठक करें और उचित सुझाव दें।

Bar & Bench

दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को राजधानी में न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा मुहैया कराने में विफल रहने पर फटकार लगाई [Judicial Service Association of Delhi v. Government of NCT of Delhi and Ors]।

कोर्ट दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन की एक पिटीशन पर विचार कर रहा था, जिसमें जजों के लिए उनके घरों पर पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर (PSO) और सिक्योरिटी अरेंजमेंट की मांग की गई थी।

जस्टिस मनोज जैन ने सरकार के रवैये को “असंवेदनशील” कहा और ज्यूडिशियल ऑफिसर की अपील पर उनकी “उदासीनता” पर नाराज़गी जताई।

“अब सही समय है। अगर हम उन्हें कोर्ट स्टाफ दे सकते हैं, तो हम उन्हें PSO भी दे सकते हैं। दिल्ली जैसे शहर में जहां क्राइम बहुत ज़्यादा है, उसे कौन रोकता है? इतनी उदासीनता क्यों? “हमें ब्यूरोक्रेट को भी देना पड़ेगा” [तो हमें ब्यूरोक्रेट को भी सिक्योरिटी देनी होगी] यह क्या जवाब है? आप ज्यूडिशियरी की आज़ादी से समझौता कर रहे हैं।”

Justice Manoj Jain

पिछली सुनवाई की तारीख पर, कोर्ट ने निर्देश दिया था कि दिल्ली सरकार, केंद्रीय गृह मंत्रालय और दिल्ली पुलिस के सीनियर अधिकारियों के बीच एक मीटिंग हो। इस मीटिंग का ब्योरा (मिनट्स) आज कोर्ट के सामने पेश किया गया।

13 अप्रैल को हुई मीटिंग का ब्योरा पढ़ने के बाद कोर्ट ने कहा, “क्या आप चाहते हैं कि पहले किसी को धमकाया जाए, उस पर हमला हो, और उसके बाद ही आप उसकी मदद के लिए आगे आएं? आप ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहते, जहाँ वे सड़कों पर बेखौफ होकर घूम सकें। आप उनके लिए वैसा माहौल नहीं बनाना चाहते।”

ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन की तरफ से पेश सीनियर वकील कीर्ति उप्पल ने बताया कि महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य अपने ज्यूडिशियल अधिकारियों को सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि कई ज्यूडिशियल अधिकारी खुद गाड़ी चलाकर कोर्ट आते हैं, और इस दौरान उन्हें पीछा किए जाने, गाली-गलौज और धमकियों जैसी कई घटनाओं का सामना करना पड़ता है।

Senior Advocate Kirti Uppal

दिल्ली सरकार के स्टैंडिंग काउंसिल संजय लाओ दिल्ली पुलिस की तरफ से पेश हुए। कोर्ट को बताया गया कि गृह मंत्रालय ने रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखा है और इस बारे में फीडबैक ले रहा है कि न्यायिक कार्यालयों के परिसर में कितने लोग रह रहे हैं और निजी आवासों में कितने लोग रह रहे हैं।

कोर्ट ने कहा "मुझे बताइए, जब खतरे की आशंका हो तो सुरक्षा देकर क्या आप कोई दान-पुण्य कर रहे हैं? आप ऐसा कैसे कह सकते हैं कि एकमात्र मुश्किल यह है कि इससे सरकारी खजाने पर बोझ पड़ सकता है? सवाल यह है कि जब कोई व्यक्ति निजी वाहन या सरकारी वाहन में सफर कर रहा हो, तो फिर ये कदम क्यों उठाए जा रहे हैं? वे असल में चौबीसों घंटे PSO (निजी सुरक्षा अधिकारी) की मांग कर रहे हैं। यह एक जायज़ मांग है।"

इसके अलावा, कोर्ट ने 13 अप्रैल को हुई बैठक के मिनट्स (कार्यवृत्त) से यह बात नोट की कि कानून, न्याय और विधायी मामलों के विभाग के प्रधान सचिव को बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया था।

इसलिए, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सात दिनों के भीतर एक और बैठक करें और उचित सुझाव दें।

"हम आपको एक और बैठक करने की अनुमति दे रहे हैं। कुछ अच्छे सुझावों के साथ आइए, ऐसे काम नहीं चलेगा। 7 दिनों के भीतर। हम इसे रिकॉर्ड पर नहीं ले रहे हैं [बैठक के मिनट्स]। जैसा कि श्री उप्पल ने कहा, यह एक असंवेदनशील रवैया है। आप यह नहीं कह सकते कि हम केवल उन्हीं अदालतों को सुरक्षा देंगे जो आपराधिक क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करती हैं। यह भी स्वीकार्य नहीं है। कृपया अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें।"

सुनवाई की अगली तारीख 12 मई है।

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