Delhi High Court  
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दिल्ली हाईकोर्ट ने पाकिस्तान को गोपनीय सैन्य दस्तावेज़ सौंपने के आरोपी व्यक्ति की जमानत याचिका खारिज की

उस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने एक मध्यस्थ के रूप में काम करते हुए, पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी को सैन्य संबंधी गुप्त और संवेदनशील जानकारी पहुंचाई।

Bar & Bench

दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐसे व्यक्ति को ज़मानत देने से इनकार कर दिया, जिस पर पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी के लिए जासूसी करने का आरोप है [हबीब उर रहमान बनाम राज्य]।

आरोपी हबीब-उर-रहमान के पास से कथित तौर पर सैन्य प्रशिक्षण से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज़ और 'गोपनीय' (confidential) बताए गए अन्य सामग्री बरामद हुई थी। उस पर यह भी आरोप है कि उसने एक बिचौलिए के रूप में काम करते हुए, पाकिस्तान उच्चायोग के एक अधिकारी तक गुप्त और संवेदनशील सैन्य जानकारी पहुंचाई थी।

रहमान के खिलाफ FIR दर्ज की गई और 2021 में उसे 'ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923' (Official Secrets Act, 1923) के तहत जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया। रहमान व्हीलचेयर पर रहता है और कई बीमारियों से पीड़ित है; उसे पहले मेडिकल ज़मानत मिल चुकी थी। इस साल जनवरी में, कोर्ट ने उसकी अंतरिम मेडिकल ज़मानत बढ़ाने से इनकार कर दिया और कहा कि वह इसके बजाय नियमित ज़मानत के लिए आवेदन कर सकता है।

25 सितंबर को दिए गए अपने आदेश में, जस्टिस संजीव नरूला ने आरोपी के खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता को देखते हुए उसे नियमित ज़मानत देने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने कहा, "इस मामले की गंभीरता केवल कानूनी धाराओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शामिल दस्तावेज़ों की प्रकृति, उनके कथित स्रोत और वे कहाँ भेजे जाने वाले थे, यह सब भी मायने रखता है।"

Justice Sanjeev Narula

रहमान के वकील ने कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि गोपनीय दस्तावेज पहले से ही कोर्ट की कस्टडी में हैं, इसलिए सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना न के बराबर है।

कोर्ट ने माना कि रहमान तीन साल से अधिक समय जेल में बिता चुके हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि जब ट्रायल के उचित समय में पूरा होने की संभावना न हो, तो केवल आपराधिक आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

हालांकि, कोर्ट ने माना कि इस मामले की परिस्थितियां कुछ अलग हैं, क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने आरोप तय (charges framed) कर दिए हैं और अभियोजन पक्ष (prosecution) ने अपने सबूत पेश करना शुरू कर दिया है।

कोर्ट ने कहा, "यहां के तथ्य काफी अलग हैं। आरोप तय हो चुके हैं और अभियोजन पक्ष के सबूत पेश किए जाने शुरू हो गए हैं।"

कोर्ट ने इस दलील पर भी ध्यान दिया कि अब तक केवल चार गवाहों से पूछताछ हुई है और अभियोजन पक्ष ने बार-बार सुनवाई टालने (adjournment) की मांग की है। कोर्ट ने माना कि जमानत देने पर विचार करते समय यह एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जो ट्रायल की धीमी गति के आधार पर जमानत देने के लिए कोर्ट को प्रेरित कर सके।

कोर्ट ने कहा, "ट्रायल कोर्ट की पूरी ऑर्डर शीट इस कोर्ट के सामने नहीं है, इसलिए मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कार्यवाही की धीमी गति के लिए कौन जिम्मेदार है। रहमान ने काफी लंबा समय जेल में बिताया है, लेकिन इस स्तर पर यह उस शुरुआती आकलन (prima facie assessment) से अधिक भारी नहीं पड़ता, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है।"

कोर्ट ने रहमान की मेडिकल स्थिति पर भी विचार किया। कोर्ट ने पाया कि जनवरी 2026 में, एम्स (AIIMS) द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर, उन्हें मेडिकल जमानत बढ़ाने से इनकार कर दिया गया था। एम्स की रिपोर्ट से पता चलता है कि रहमान को जेल के अंदर भी जरूरी इलाज मुहैया कराया जा सकता है।

कोर्ट ने कहा, "हालांकि, रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया है कि सुझाया गया इलाज हिरासत में नहीं दिया जा सकता, या यह कि जेल में रहना उनकी मौजूदा मेडिकल स्थिति के हिसाब से बिल्कुल भी ठीक नहीं है।"

इसलिए, कोर्ट ने रहमान को नियमित जमानत (regular bail) देने से इनकार कर दिया।

रहमान की जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, "इसलिए, मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर इस स्तर पर उन्हें नियमित जमानत पर रिहा करने का कोई ठोस कारण नहीं बनता है।"

अदालत ने जेल अधीक्षक को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि रहमान को जेल में ही जरूरी मेडिकल जांच, विशेषज्ञ से परामर्श, फिजियोथेरेपी और इलाज उपलब्ध कराया जाए।

रहमान की ओर से वकील वी. मधुकर, राकेश शर्मा, कनिष्का भट्ट, नीरज कुमार, साक्षी और विक्रांत चौहान पेश हुए।

राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक युधवीर सिंह चौहान और वकील नरेंद्र कुमार पेश हुए।

[आदेश पढ़ें]

Habib_Ur_Rahman_Vs_State.pdf
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Delhi High Court denies bail to man accused of passing classified military documents to Pakistan