UAPA, Delhi High Court  
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दिल्ली हाईकोर्ट ने 8 साल से हिरासत में बंद UAPA के आरोपी को ज़मानत दी

ज़मानत की अन्य शर्तों के अलावा, कोर्ट ने आरोपी को सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से कोई भी राष्ट्र-विरोधी सामग्री साझा करने से रोक दिया है।

Bar & Bench

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को भारत सरकार के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने के आरोपी एक व्यक्ति को ज़मानत दे दी। कोर्ट ने यह देखते हुए ज़मानत दी कि वह लगभग आठ साल से अंडर-ट्रायल (मुक़दमे का सामना कर रहा) कैदी के तौर पर जेल में है और उसके ख़िलाफ़ मुक़दमा अभी खत्म होने से बहुत दूर है [मोहम्मद साकिब @ साकिब इफ़्तेखार बनाम NIA]।

14 सितंबर को दिए गए फ़ैसले में, जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने मोहम्मद साकिब को ज़मानत दे दी। साकिब पर 2018 में गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत मामले दर्ज किए गए थे।

कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ट्रायल के जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है और साकिब पहले ही लगभग आठ साल जेल में बिता चुका है। कोर्ट ने यह भी देखा कि अभियोजन पक्ष के 120 गवाहों में से अब तक सिर्फ़ 40 गवाहों के बयान ही दर्ज किए गए हैं।

Justice Navin Chawla and Justice Ravinder Dudeja

इस मामले में साकिब को 2018 में गिरफ़्तार किया गया था। नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) का आरोप था कि वह 'हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम' नाम के एक प्रो-IS ग्रुप का सदस्य था, उसने ट्रेनिंग के लिए जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों के साथ मीटिंग्स में मदद की थी और सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने के लिए हथियार जुटाए थे।

साकिब की ज़मानत अर्ज़ी को पहले पटियाला हाउस कोर्ट के एडिशनल सेशंस जज ने खारिज कर दिया था। इसलिए, उसने राहत के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

अपनी ज़मानत अर्ज़ी में साकिब ने कहा कि वह आतंकी साज़िश के मुख्य मॉड्यूल में शामिल नहीं था और ज़्यादा से ज़्यादा, सिर्फ़ एक मामूली भागीदार था।

NIA ने ज़मानत अर्ज़ी का विरोध करते हुए कहा कि सिर्फ़ ट्रायल पूरा होने में देरी साकिब को ज़मानत देने की वजह नहीं हो सकती।

कोर्ट ने कहा कि उसे इस मामले में गवाहों के बयान पहली नज़र में इतने "गंभीर" नहीं लगे कि साकिब की हिरासत को और बढ़ाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि हालांकि साकिब के फ़ोन से कथित तौर पर बरामद सामग्री गंभीर है, लेकिन यह अभी उसकी हिरासत को जारी रखने के लिए काफ़ी नहीं है।

कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और साकिब को ज़मानत दे दी।

कोर्ट ने कहा, "गवाहों के बयानों और अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ आरोपों पर विचार करने के बाद, और खासकर अपीलकर्ता की लंबी हिरासत अवधि को देखते हुए, हमारी राय है कि अपीलकर्ता ज़मानत पर रिहा होने का मामला बनाने में सफल रहा है।"

कोर्ट ने साकिब पर ज़मानत की कई शर्तें भी लगाईं। अन्य शर्तों के अलावा, कोर्ट ने साकिब को निर्देश दिया कि वह हापुड़ में अपनी मूल जगह से बाहर यात्रा न करे, सिवाय इसके कि वह अपने ख़िलाफ़ ट्रायल में शामिल होने या NIA ऑफ़िस में रिपोर्ट करने के लिए दिल्ली जाए। उसे हर पखवाड़े (दो हफ़्ते में एक बार) NIA के लखनऊ ऑफ़िस में रिपोर्ट करने का निर्देश दिया गया है।

साकिब को अपना पासपोर्ट ट्रायल कोर्ट में जमा करने का भी निर्देश दिया गया। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि उसे अपने ट्रायल के पूरा होने तक केवल एक मोबाइल फ़ोन और/या लैंडलाइन इस्तेमाल करने की इजाज़त है, और वह NIA और ट्रायल कोर्ट को सात दिन पहले बताए बिना अपनी संपर्क जानकारी या निवास स्थान नहीं बदल सकता।

कोर्ट ने आगे कहा कि उसे सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से कोई "राष्ट्र-विरोधी सामग्री" साझा या प्रसारित नहीं करनी चाहिए। साकिब की ओर से वकील सरीम नावेद पेश हुए।

एनआईए की ओर से वकील राहुल त्यागी, प्रिया राय, अविनाश कुमार सिंह, प्रियांश राज सिंह और अमित रोहिला पेश हुए।

[निर्णय पढ़ें]

Mohammad_Saqib__Saqib_Iftekar_vs_NIA.pdf
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Delhi High Court grants bail to UAPA accused in custody for 8 years