दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक तमिल पत्रिका 'नक्कीरन' द्वारा जग्गी वासुदेव के 'ईशा फाउंडेशन' के खिलाफ पोस्ट की गई मानहानिकारक सामग्री को हटाने का आदेश दिया।
जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद ने ईशा फाउंडेशन के पक्ष में अंतरिम आदेश पारित किया।
अदालत ने नकीरन द्वारा दायर एक अर्जी भी खारिज कर दी, जिसमें उसने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के तहत ईशा फाउंडेशन के मुकदमे को खारिज करने की मांग की थी।
ईशा फाउंडेशन ने नकीरन और उसके संपादक गोपाल से ₹3 करोड़ के हर्जाने की मांग करते हुए अदालत का रुख किया था। फाउंडेशन ने Google LLC को भी इस मामले में एक पक्ष बनाया है, क्योंकि Google सर्च पर मानहानिकारक सामग्री दिखाई दे रही थी और उसके प्लेटफॉर्म YouTube पर वीडियो पोस्ट किए जा रहे थे।
ईशा फाउंडेशन ने दलील दी कि नखीरन ने उसके खिलाफ आलोचनात्मक सामग्री प्रकाशित की। इन रिपोर्टों में फाउंडेशन के भीतर कई तरह के गलत कामों के आरोप लगाए गए थे, जिनमें शोषण, ब्रेनवाशिंग और गैर-कानूनी गतिविधियों के दावे शामिल थे। ऐसे आरोपों से यह संकेत मिलता था कि फाउंडेशन में मौजूद लोगों को उनकी मर्ज़ी के खिलाफ रोका जा रहा है या उन्हें कुछ खास काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
ईशा के मुताबिक, नखीरन ने ये लेख तब भी प्रकाशित किए, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका पर सुनवाई बंद करने का आदेश दिया था। उस पिता ने आरोप लगाया था कि उसकी दो बेटियों की फाउंडेशन द्वारा "ब्रेनवाशिंग" की गई है।
यह मामला तब सामने आया, जब मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को ईशा फाउंडेशन के खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों का ब्योरा जमा करने का निर्देश दिया।
यह निर्देश तब आया, जब एक व्यक्ति ने कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसकी 42 और 39 साल की दो बेटियों की "ब्रेनवाशिंग" करके उन्हें ईशा योग केंद्र में रहने के लिए मजबूर किया गया है।
18 अक्टूबर, 2024 को, सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने—जिसमें तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस जे.बी. पारदीवाला व जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे—यह पाया कि वे दोनों महिलाएं बालिग हैं और उन्होंने योग केंद्र में ही रहने की अपनी इच्छा साफ तौर पर ज़ाहिर की है।
CJI चंद्रचूड़ ने कहा, "हमने उन दोनों महिलाओं से बात की और उनके बयान दर्ज किए। उन दोनों ने कहा कि वे अपनी मर्ज़ी से वहां रह रही हैं, इसलिए हमें इस बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को बंद कर देना चाहिए।"
लिहाज़ा, कोर्ट ने ईशा फाउंडेशन के खिलाफ चल रहे इस मामले को बंद कर दिया। हालांकि, बेंच ने यह साफ कर दिया कि उसके इस आदेश से पुलिस को किसी अन्य मामले में जांच आगे बढ़ाने से नहीं रोका जाएगा।
इसके बाद, ईशा फाउंडेशन ने नखीरन द्वारा प्रकाशित मानहानिकारक लेखों के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
ईशा फाउंडेशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव के साथ अधिवक्ता रोहन जेटली, मेहरुन्निसा आनंद जेटली, अरीब, देव प्रताप शाही, वरुण प्रताप सिंह, योग्य भाटिया, पुष्पवेणी और सिमरजीत कोर्ट में पेश हुए।
अधिवक्ता वीटी पेरुमल, डॉ. राम शंकर, के वैजयंती, शारुमथी, अश्विन सैम और नागेंद्र ने नक्खीरन का प्रतिनिधित्व किया।
अधिवक्ता आदित्य गुप्ता और रोहित वेंकटेशन और वाणी कौशिक ने गूगल का प्रतिनिधित्व किया।
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