सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किए। ये नोटिस हाल ही में दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी कई याचिकाओं पर दिए गए हैं, जिनमें पुलिस की कथित ज्यादतियों, लोगों की आवाजाही पर पाबंदियों और जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन स्थल के रूप में डी-नोटिफाई (अधिसूचना रद्द) करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची शामिल थे, ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों को विरोध-प्रदर्शनों से जुड़े CCTV फुटेज और अन्य रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया।
अदालत ने कहा, "कानून लागू करने वाली सभी एजेंसियों को निर्देश दिया जाता है कि वे अपने पास मौजूद CCTV फुटेज या किसी अन्य डिजिटल सामग्री को सुरक्षित रखें। इसी तरह, निजी पक्षों के पास मौजूद ऐसी सामग्री को भी वे चाहें तो सुरक्षित रख सकते हैं।"
आज कोर्ट ने इस मामले में सबूत सुरक्षित रखने का आदेश देने के अलावा कोई बड़ा निर्देश नहीं दिया।
CJI कांत ने कहा, "विरोध-प्रदर्शन से जुड़े बाकी सभी मामलों में हम नोटिस जारी कर रहे हैं। कुछ याचिकाएं एक-दूसरे से मिलती-जुलती हैं। हम सॉलिसिटर जनरल की तरफ से एक 'नोडल वकील' (समन्वयक वकील) नियुक्त करने का अनुरोध कर सकते हैं। हम याचिकाकर्ताओं से भी कहेंगे कि वे एक 'नोडल वकील' नियुक्त करें, जो इन सभी याचिकाओं को देख सके और सामने आने वाले मुद्दों को एक साथ संकलित कर सके, जिसमें एक-दूसरे से मिलते-जुलते मुद्दों की पहचान करना भी शामिल है। इन सभी मामलों में हम नोटिस जारी कर रहे हैं और प्रतिवादियों से अपना जवाब दाखिल करने को कह रहे हैं।"
कोर्ट ने आग्रह किया कि विरोध-प्रदर्शनों के संबंध में अब और याचिकाएं दाखिल न की जाएं।
CJI कांत ने कहा, "हम वकीलों से पुरजोर अपील करते हैं कि वे और याचिकाएं दाखिल न करें। पहले से ही 46 मामले लंबित हैं।"
जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन की अनुमति रद्द (डी-नोटिफिकेशन) किए जाने को चुनौती देने वाले मामले में, कोर्ट ने कोई तत्काल आदेश देने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने इस पर दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है।
CJI कांत ने कहा, "आपने अनुमति रद्द किए जाने को चुनौती दी है। हम नोटिस जारी कर रहे हैं। उन्हें अपना जवाब दाखिल करने दें। हम देखेंगे कि इसके पीछे क्या कारण हैं।"
यह बात तब सामने आई जब वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने मांग की कि जंतर-मंतर को फिर से विरोध-प्रदर्शन के लिए अधिसूचित (नोटिफाई) किया जाए।
वरिष्ठ वकील ने कहा, "ऐसा लगता है कि यह अनुमति कोर्ट के निर्देश पर रद्द की गई है। संभवतः 9 अक्टूबर को कोई निर्देश दिया गया था कि जंतर-मंतर की अनुमति रद्द कर दी जाए।"
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आज स्पष्ट किया कि यह फैसला किसी अदालती आदेश के कारण नहीं लिया गया है।
मेहता ने कहा, "इस फैसले का आधार कोर्ट का कोई फैसला नहीं है। समिति का गठन बहुत पहले ही कर दिया गया था। समिति ने एक विस्तृत रिपोर्ट दी है।"
वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता ने दलील दी कि विरोध-प्रदर्शन करने के नागरिक के मौलिक अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही 'मजदूर किसान शक्ति संगठन' मामले में यह फैसला दे चुका है कि विरोध-प्रदर्शन की जगह ऐसी होनी चाहिए जो लोगों की पहुंच में हो, ताकि प्रदर्शनकारियों की बात सुनी जा सके।
वरिष्ठ वकील ने कहा, "नई दिल्ली सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों के लिए नहीं है।"
अदालत के समक्ष याचिकाएं
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता एम.ए. बेबी की एक याचिका और उससे जुड़ी अवमानना की कार्यवाही में, लगाई गई पाबंदियों और उनके कार्यान्वयन पर सवाल उठाए गए हैं।
अधिवक्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने अलग से जनपथ-कर्तव्य पथ इलाके के आसपास मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने को चुनौती दी है।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन और लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन ने भी वकीलों को कथित तौर पर हिरासत में लेने और उनके साथ दुर्व्यवहार किए जाने के संबंध में याचिकाएं दायर की हैं। उन्होंने जवाबदेही तय करने, सबूत सुरक्षित रखने और अदालतों तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षा उपायों की मांग की है।
'द फ्री स्पीच कलेक्टिव', 'नेटवर्क ऑफ विमेन इन मीडिया, इंडिया' और 'दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स' ने भी प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर कथित हमले, उन्हें हिरासत में लेने और उनके काम में बाधा डालने के मामलों को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया है। अवमानना की अलग-अलग कार्यवाहियों में मीडियाकर्मियों की सुरक्षा से जुड़े निर्देशों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
सांसद ए.ए. रहीम और मनोज कुमार झा की याचिकाओं में प्रदर्शनकारियों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लेने, हिरासत में हिंसा करने और पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग करने के आरोप लगाए गए हैं। सांसद मेनका गुरुस्वामी ने राजनीतिक नेताओं को हिरासत में लिए जाने को चुनौती दी है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका भी अदालत के समक्ष है।
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