केरल हाई कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि पासपोर्ट अधिकारी इस बात पर ज़ोर नहीं दे सकते कि तलाकशुदा व्यक्ति को अपने पासपोर्ट से अपने पूर्व जीवनसाथी का नाम हटवाने के लिए तलाक का अदालती आदेश (डिक्री) पेश करना होगा।
न्यायमूर्ति मुरली पुरूषोतमन ने कहा कि प्रासंगिक नियमों के अनुसार तलाकशुदा व्यक्ति जो अपने पासपोर्ट से पूर्व पति या पत्नी का नाम हटाने के लिए आवेदन दायर करता है, उसे यह साबित करने के लिए तलाक की डिक्री प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं है कि विवाह विघटित हो गया है।
इस संबंध में, न्यायाधीश ने पासपोर्ट नियम, 1980 की अनुसूची III का उल्लेख किया, जो 'आवेदन के साथ संलग्न किए जाने वाले दस्तावेजों' से संबंधित है।
इस प्रकार, न्यायालय ने माना कि पासपोर्ट अधिकारी किसी अतिरिक्त दस्तावेजी आवश्यकता को लागू करने के लिए कार्यकारी निर्देश या कार्यालय ज्ञापन का उपयोग नहीं कर सकते हैं, जिस पर वैधानिक नियमों के तहत विचार नहीं किया गया है।
कोर्ट एक मुस्लिम महिला की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। महिला ने अपने पूर्व पति का नाम पासपोर्ट से हटवाने और नया पासपोर्ट जारी करवाने के लिए पासपोर्ट अधिकारियों के पास आवेदन किया था।
लेकिन, पासपोर्ट अधिकारियों ने उसका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसने कोर्ट से तलाक का आदेश पेश नहीं किया था।
खास बात यह है कि याचिकाकर्ता और उसके पति का तलाक 2025 में 'तलाक' के ज़रिए हुआ था, जो मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत आता है। दोनों पति-पत्नी के बीच हुए समझौते के बाद, याचिकाकर्ता के पूर्व पति ने उसे तलाक दिया था।
इसका मतलब यह भी था कि याचिकाकर्ता के पास कोर्ट से जारी तलाक की डिक्री नहीं थी जिसे वह पासपोर्ट अधिकारियों के सामने पेश कर सके, जैसा कि वे पासपोर्ट से पूर्व पति का नाम हटाने के लिए मांग रहे थे।
इसलिए, उसने राहत पाने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।
इससे पहले, पासपोर्ट अधिकारियों ने विदेश मंत्रालय द्वारा सितंबर 2024 में जारी ऑफिस मेमोरेंडम का हवाला देते हुए अपना पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि पहले की आसान प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल किया जा रहा था, जिसमें आवेदक बिना जानकारी के तीसरे व्यक्ति का नाम अपने जीवनसाथी के तौर पर दर्ज करवा देते थे। इस स्थिति को सुधारने के लिए जारी मेमोरेंडम में जीवनसाथी का नाम हटाने के लिए तलाक की डिक्री पेश करना अनिवार्य कर दिया गया था।
हालांकि, कोर्ट ने बताया कि पासपोर्ट नियमों में जीवनसाथी का नाम हटाने के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं रखी गई थी।
कोर्ट ने कहा, "कानून पासपोर्ट में नाम बदलने या जीवनसाथी का नाम हटाने के लिए शादी या शादी टूटने का दस्तावेज़ी सबूत (जिसमें तलाक की डिक्री भी शामिल है) पेश करने की ज़रूरत को खत्म करता है।"
कोर्ट ने 'आयशात बुनायत बनाम भारत संघ' मामले में अपने पहले के फैसले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया था कि जब शादी 'मुबारात' (मुस्लिम पति-पत्नी की आपसी सहमति से तलाक) के ज़रिए खत्म हुई हो, तो पासपोर्ट अधिकारी तलाक की डिक्री की ज़िद नहीं कर सकते।
कोर्ट ने आगे कहा कि जिस तरह 'मुबारात' मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक का एक मान्यता प्राप्त तरीका है, उसी तरह पति द्वारा दिया गया 'तलाक' भी मान्य है, भले ही उसका कोई दस्तावेज़ी सबूत न हो।
इसके बाद कोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को निर्देश दिया कि वह महिला के पासपोर्ट से पूर्व पति का नाम हटाने के आवेदन पर फिर से विचार करे और एक महीने के भीतर उस पर फैसला ले। याचिकाकर्ता की ओर से वकील MS शाजू पुरुषोत्तमन और KS राजेश पेश हुए।
भारत के डिप्टी सॉलिसिटर जनरल OM शालिना ने केंद्र सरकार और पासपोर्ट अधिकारियों का प्रतिनिधित्व किया।
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Divorce decree not needed to delete ex-spouse's name from passport: Kerala High Court