इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में इस बात पर ज़ोर दिया कि शादीशुदा महिला के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को दहेज के लिए परेशान किए जाने या घरेलू क्रूरता की उसकी शिकायतों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए [दिनेश कुमार और अन्य बनाम यूपी राज्य]।
जस्टिस राजेश सिंह चौहान और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने कहा कि दहेज के लिए परेशान किए जाने या वैवाहिक क्रूरता की शिकार महिलाओं को समझौता करने या हालात से तालमेल बिठाने की सलाह देने से दोषियों का हौसला बढ़ेगा।
कोर्ट ने कहा, "अक्सर दहेज से जुड़ी प्रताड़ना की शिकार महिला को समझौता करने या शादी बचाने की सलाह दी जाती है, भले ही उसने अपने परिवार को उस पर हो रही क्रूरता के बारे में बार-बार बताया हो। कोर्ट का मानना है कि कभी-कभी ऐसी सलाह अनजाने में ही दोषियों का हौसला बढ़ा सकती है और पीड़िता को लगातार दुर्व्यवहार का शिकार बना सकती है, जिसका नतीजा दुखद और कभी न सुधरने वाला हो सकता है - यहाँ तक कि पीड़िता की मौत भी हो सकती है।"
कोर्ट ने यह टिप्पणी 27 जुलाई को एक महिला और उसकी 15 महीने की बेटी की दहेज के कारण हुई मौत के मामले की सुनवाई के दौरान की।
कोर्ट ने गौर किया कि पीड़िता ने कई बार अपने परिवार वालों को ससुराल वालों की लगातार दहेज की मांग और उनके द्वारा किए जा रहे दुर्व्यवहार के बारे में बताया था।
बेंच ने कहा कि ऐसी बार-बार की शिकायतों को सामान्य वैवाहिक मतभेद नहीं माना जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि इन्हें मदद, सुरक्षा और समय पर दखल की असली गुहार के तौर पर देखा जाना चाहिए था।
बेंच ने कहा, "कोर्ट का मानना है कि यह मामला याद दिलाता है कि जब भी कोई बेटी मदद के लिए बार-बार अपने परिवार के पास आती है और ससुराल में हो रहे दुर्व्यवहार, डर और अपमान के बारे में बताती है, तो उसकी बातों को सहानुभूति, गंभीरता और तत्परता से सुना जाना चाहिए। परिवार की यह नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वे उसका साथ दें, उसकी बात पर भरोसा करें और उसकी सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित करने के लिए सभी ज़रूरी कदम उठाएं।"
कोर्ट उन क्रिमिनल अपीलों पर सुनवाई कर रहा था जो पीड़िता के पति, दो जीजा/साले (brother-in-laws), सास और ससुर ने दायर की थीं। उन्हें 2016 में एक ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-B के तहत दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी।
2011 के इस मामले में, 25 साल की मीना देवी और उनकी 15 महीने की बेटी की हत्या दहेज की एक अधूरी मांग के कारण कर दी गई थी।
आरोप था कि शादी के समय पीड़िता के परिवार वालों ने ₹2.26 लाख दिए थे, लेकिन इसके अलावा एक मोटरसाइकिल और ₹1 लाख की मांग भी की गई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि सबूतों से दहेज के कारण मौत और घरेलू क्रूरता के कानूनी आधार साफ तौर पर साबित होते हैं। इसलिए, कोर्ट ने सज़ा को बरकरार रखा।
दहेज के कारण होने वाली मौतों के मामलों में तुरंत दखल देने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए, कोर्ट ने कहा कि न्याय पाने के लिए कानूनी कार्यवाही ज़रूरी और तारीफ़ के काबिल है, लेकिन वे समय पर की जाने वाली उस कार्रवाई की जगह नहीं ले सकतीं जो ऐसी मौतों को रोक सकती है।
कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि यह मामला सिर्फ़ आरोपियों को ज़िम्मेदार ठहराने और कानून के मुताबिक सज़ा देने का नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा संदेश भी देता है कि बेटी की मदद की हर गुहार पर सहानुभूति, गंभीरता और तुरंत कार्रवाई के साथ ध्यान दिया जाना चाहिए।
बेंच ने कहा, "समय पर दखल देने से कभी न पूरा होने वाले नुकसान को रोका जा सकता है, जबकि देर से पछतावा करने और कानूनी लड़ाई लड़ने से जा चुकी जान वापस नहीं आ सकती।"
कोर्ट ने आगे कहा कि यह परिवारों, समुदायों और समाज की मिली-जुली ज़िम्मेदारी है कि वे यह पक्का करें कि कोई भी महिला चुपचाप दुख सहने को मजबूर न हो और मदद के लिए की गई हर पुकार का जवाब दिया जाए।
बेंच ने कहा, "परिवारों, रिश्तेदारों और पूरे समाज को यह समझना चाहिए कि दहेज के लिए परेशान करने या घरेलू क्रूरता की हर शिकायत पर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए, ताकि बहुत देर होने से पहले उसका सार्थक और असरदार समाधान निकाला जा सके।"
हालांकि कोर्ट ने सज़ा को बरकरार रखा, लेकिन आरोपियों की सज़ा को उम्रकैद से घटाकर उतनी ही कर दिया जितनी वे पहले ही काट चुके थे।
कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट IPC की धारा 304-B के तहत अधिकतम सज़ा देने का कारण बताने में नाकाम रहा था।
अधिवक्ता दीपशिखा सिंह, धनंजय कुमार सिंह, गुलाम मोहम्मद कामिल, कुँवर धनंजय सिंह, पीयूष कुमार सिंह और व्यास नारायण शुक्ला ने दोषियों का प्रतिनिधित्व किया।
[निर्णय पढ़ें]
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Don’t tell married daughters to adjust; take cruelty complaints seriously: Allahabad High Court