सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार, चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की मंज़ूरी के बिना भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के नाम पर फ़ैसले ले रहे हैं।
याचिका में 'को वारंटो' (अधिकार-पृच्छा) रिट की मांग की गई है। इसमें CEC से यह बताने को कहा गया है कि उन्होंने किस अधिकार के तहत ऐसे काम किए हैं और कर रहे हैं, जैसे कि वे अकेले ही उस सामूहिक निर्णय लेने की शक्ति का इस्तेमाल कर सकते हों, जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत एक संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को दी गई है।
ECI में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और दो चुनाव आयुक्त (EC) होते हैं।
अभी, ज्ञानेश कुमार CEC हैं, जबकि सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी दो EC हैं।
जब भी तीनों के बीच आम सहमति नहीं बनती, तो बहुमत के आधार पर फैसले लिए जाते हैं।
हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, ECI ने कई फैसले ऐसे लिए जिन पर दो चुनाव आयुक्त सहमत नहीं थे।
राकेश कुमार सिंह की ओर से कोर्ट में दायर याचिका में सत्ता के "लगातार केंद्रीकरण", एजेंडा और बैठकों के विवरण (मिनट्स) की कमी या देरी, मतदाता सूची की प्रक्रियाओं में बदलाव और दो चुनाव आयुक्तों की जानकारी या मंज़ूरी के बिना अपील दायर करने का आरोप लगाया गया है।
याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' के अनुसार, ECI का कामकाज जहां तक संभव हो, आम सहमति से किया जाना चाहिए। और अगर किसी मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की राय अलग-अलग हो, तो उस मामले का फैसला बहुमत की राय के आधार पर किया जाएगा।
हालांकि, खबरों के अनुसार, 28 अक्टूबर 2025 और 14 अगस्त 2026 के बीच, दो चुनाव आयुक्तों ने ECI की मंज़ूरी के बिना ECI के नाम पर उठाए गए कदमों पर कम से कम चौदह अलग-अलग आपत्तियां जताई थीं।
याचिका में कहा गया है, "अगर संविधान और 2023 के अधिनियम के तहत ज़रूरी भागीदारी के बिना, एक बहु-सदस्यीय संस्था के तौर पर चुनाव आयोग को मिली संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल असल में या वास्तव में उसके भीतर का कोई एक अधिकारी कर सकता है, तो मतदाता सूची में कौन होगा और इसलिए कौन वोट दे सकता है, यह तय करने वाले फैसले एक गंभीर संवैधानिक सवाल खड़ा करते हैं कि क्या ऐसे फैसले उस संवैधानिक प्राधिकरण द्वारा लिए जा रहे हैं जिसे संविधान ने इसी मकसद के लिए बनाया था।"
याचिका में 'को वारंटो' (अधिकार-पृच्छा) रिट की मांग की गई है, जिसमें CEC से ऐसे फैसलों के बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया है।
याचिका में कहा गया है कि अगर यह पाया जाता है कि CEC ने 2023 के कानून की धारा 18 के तहत आयोग के फैसले के बिना ऐसी सामूहिक शक्तियों का इस्तेमाल किया है या कर रहा है, तो शक्तियों के ऐसे इस्तेमाल को अमान्य घोषित किया जाना चाहिए।
याचिका में यह घोषणा करने की भी मांग की गई है कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) और SIR के तहत की गई सभी कार्रवाइयां, फैसले, निर्देश और उसके बाद उठाए गए कदम शुरू से ही अमान्य (void ab initio) और बिना कानूनी अधिकार के माने जाएं।
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें