केरल उच्च न्यायालय ने कहा है कि अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना कर रहे किसी न्यायिक अधिकारी को अपना बचाव करने के लिए वकील रखने पर जोर देने का अधिकार नहीं है, जबकि वह किसी अन्य न्यायिक अधिकारी की मदद से अपना पक्ष रखने में सक्षम है।
न्यायमूर्ति गोपीनाथ पी ने एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। यह याचिका एक कार्यरत अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (याचिकाकर्ता) ने दायर की थी, जिसमें उन्होंने अनुशासनात्मक जांच के दौरान अपना पक्ष रखने के लिए वकील रखने की अनुमति न दिए जाने को चुनौती दी थी।
अदालत ने कहा कि हालांकि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगे आरोप गंभीर हैं, लेकिन वे जटिल नहीं हैं। ऐसे में, जिला न्यायाधीश रैंक के किसी अन्य न्यायिक अधिकारी की मदद लेकर इन आरोपों का बचाव किया जा सकता है।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला, "मेरा मानना है कि याचिकाकर्ता इस बात पर जोर नहीं दे सकता कि उसे जांच प्राधिकरण के समक्ष चल रही कार्यवाही में अपना बचाव करने के लिए वकील रखने की अनुमति दी ही जाए।"
अदालत में यह याचिका एक कार्यरत सेशन जज ने दायर की थी। उन्होंने अपने खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान 'जांच प्राधिकरण' (Inquiring Authority) द्वारा लिए गए कुछ फैसलों को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता ने बताया कि जांच प्राधिकरण, जो कि एक हाई कोर्ट जज हैं, ने शुरू में उन्हें अगस्त 2025 में वकील रखने की अनुमति दे दी थी।
हालांकि, बाद में 'प्रस्तुतकर्ता अधिकारी' (presenting officer) - जो कि एक जिला जज स्तर के न्यायिक अधिकारी हैं और याचिकाकर्ता के खिलाफ अनुशासनात्मक मामले को पेश करने के लिए नियुक्त किए गए हैं - की आपत्ति के बाद यह अनुमति वापस ले ली गई।
याचिकाकर्ता ने अनुमति न दिए जाने के इस फैसले को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें कानूनी प्रतिनिधित्व (वकील रखने) की अनुमति मिलनी चाहिए, खासकर इसलिए क्योंकि यह जांच एक हाई कोर्ट जज द्वारा की जा रही है। उन्होंने अपने खिलाफ लगाए गए कुछ आरोपों में किए गए बदलावों को भी चुनौती दी। उन्होंने बताया कि ये बदलाव तब किए गए, जब शिकायतकर्ता सहित कई गवाहों से पूछताछ पूरी हो चुकी थी।
हाई कोर्ट प्रशासन ने इस याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि केरल सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1960 (1960 के नियम) के नियम 15(6) के तहत, अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान वकील रखने के अधिकार पर रोक है।
इस मामले पर विचार करते हुए, अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला दिया। इन फैसलों में इस बात पर जोर दिया गया था कि यदि अनुशासनात्मक जांच करने वाला व्यक्ति या आरोप पेश करने वाला व्यक्ति कानूनी रूप से प्रशिक्षित है, तो जांच का सामना कर रहे कर्मचारी को कानूनी सहायता (वकील) न देना अनुचित हो सकता है।
हालांकि, 'दिनेश चंद्र पांडे बनाम मध्य प्रदेश हाई कोर्ट और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखने के बाद, अदालत ने पाया कि इस मामले में याचिकाकर्ता की मांग को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
'दिनेश चंद्र' मामले में भी एक न्यायिक अधिकारी ने इसी तरह की चुनौती दी थी, जिन्हें अनुशासनात्मक कार्यवाही के दौरान वकील रखने की अनुमति नहीं दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर अनुशासनात्मक जांच में वकील रखने की अनुमति देना अनिवार्य नहीं है।
इस मामले में, अदालत ने गौर किया कि याचिकाकर्ता ने आरोपों के खिलाफ अपना बचाव करने में मदद के लिए पहले ही एक अन्य न्यायिक अधिकारी को चुन लिया था। अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि अब उस न्यायिक अधिकारी के लिए वकील रखने पर जोर देने का कोई कारण नहीं बनता।
अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि कानूनी प्रतिनिधित्व की मांग खारिज होने के बाद भी, याचिकाकर्ता उस न्यायिक अधिकारी की मदद से अनुशासनात्मक कार्यवाही में हिस्सा लेता रहा।
इसके बाद, अदालत ने याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील एस. श्रीकुमार पेश हुए, जिन्हें वकील पी. मार्टिन जोस ने निर्देश दिए थे। उनके साथ वकील पी. प्रिजित, थॉमस पी. कुरुविला, अजय बेन जोस, मंजूनाथ मेनन, हरिकृष्णन एस., अनवद्या सानिल कुमार, अंजलि कृष्णा, आदर्श वी. मनोज और अभिनव पी.एस. भी मौजूद थे।
हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से स्टैंडिंग काउंसिल शजना एम. पेश हुईं।
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Judge can't insist on lawyer to represent him during disciplinary inquiry: Kerala High Court