सुप्रीम कोर्ट की एक बड़ी बेंच यह तय करेगी कि क्या ट्रेडमार्क उल्लंघन के मामलों की सुनवाई ज़िला अदालत के निचले स्तर की कमर्शियल अदालतों में हो सकती है, जबकि ट्रेड मार्क्स एक्ट में ज़िला अदालत से निचली अदालतों में ऐसे मामलों की सुनवाई पर साफ़ तौर पर रोक लगाई गई है [ISDS बनाम खेमका]।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा कि ट्रेड मार्क्स एक्ट और आर्बिट्रेशन एक्ट जैसे स्पेशल कानूनों और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के बीच तालमेल को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में टकराव जैसा लग रहा है।
कोर्ट ने कहा, "हमारी विनम्र राय में, हाई कोर्ट द्वारा जारी नोटिफिकेशन से कानून बनाने वाली संस्था (लेजिस्लेचर) की मंज़ूरी या अधिकार को कम नहीं किया जा सकता है।"
इसके बाद कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा जाए ताकि एक उपयुक्त बड़ी बेंच का गठन किया जा सके और सभी राज्यों में कानून को एक समान रूप से तय किया जा सके।
यह मामला ISDS प्राइवेट लिमिटेड द्वारा खेमका फूड प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दायर की गई अपील से जुड़ा है।
ट्रेड मार्क्स एक्ट की धारा 134 के तहत, ट्रेडमार्क के उल्लंघन और कुछ अन्य राहतों से जुड़े मुकदमे डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से निचली अदालत में दायर नहीं किए जा सकते।
हालांकि, कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत, कुछ राज्यों में हाई कोर्ट ने सिविल जजों (सीनियर डिविजन) को कमर्शियल कोर्ट के तौर पर नोटिफाई किया है। झारखंड में, ऐसी अदालतों को ₹3 लाख से ₹1 करोड़ के बीच के कमर्शियल विवादों पर अधिकार क्षेत्र दिया गया है।
अपील करने वालों ने तर्क दिया कि सिविल जजों (सीनियर डिविजन) के सामने ट्रेडमार्क से जुड़े मुकदमे दायर करने की इजाज़त देने से ट्रेड मार्क्स एक्ट के खास प्रावधान कमज़ोर पड़ जाएंगे।
उन्होंने यह भी बताया कि ऐसी कमर्शियल कोर्ट से अपील हाई कोर्ट के बजाय डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में होगी। नतीजतन, मुक़दमा करने वाले के पास हाई कोर्ट में अपील का सामान्य रास्ता नहीं होगा और वह मुख्य रूप से रिविजनल या सुपरवाइजरी अधिकार क्षेत्र तक ही सीमित रहेगा।
जवाब देने वालों ने तर्क दिया कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़े विवादों को स्पष्ट रूप से कमर्शियल विवाद माना गया है।
उन्होंने कहा कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट एक बाद में बना खास कानून था जिसका मकसद कमर्शियल विवादों का तेज़ी से निपटारा करना था और इसके खास प्रावधान पुराने कानूनों के विरोधाभासी प्रावधानों पर हावी होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने 'कांडला एक्सपोर्ट कॉरपोरेशन बनाम OCI कॉरपोरेशन' और 'जेसी हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड बनाम रजिस्ट्रार (जनरल), उड़ीसा हाई कोर्ट' में अपने पिछले फैसलों की समीक्षा की।
कांडला एक्सपोर्ट मामले में, कोर्ट ने आर्बिट्रेशन एक्ट को एक आत्मनिर्भर खास कानून माना था, जो अपील के मामले में कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के सामान्य प्रावधानों पर हावी था।
हालांकि, जेसी हाउसिंग मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत अधिकार क्षेत्र से जुड़े प्रावधानों को कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के सामने झुकना होगा, क्योंकि यह बाद में बना था और इसमें एक ओवरराइडिंग क्लॉज़ (प्रावधानों पर हावी होने वाला नियम) था।
बेंच ने देखा कि इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी अधिकार, जिसमें ट्रेडमार्क भी शामिल हैं, कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत आने वाले "कमर्शियल विवादों" की व्यापक श्रेणी के भीतर सिर्फ़ एक कैटेगरी हैं।
साथ ही, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ट्रेड मार्क्स एक्ट विशेष रूप से डिस्ट्रिक्ट कोर्ट को अधिकार क्षेत्र देता है और निचली अदालतों में खास मुकदमे दायर करने पर स्पष्ट रूप से रोक लगाता है।
कोर्ट ने कहा कि टकराव तब पैदा होता है जब हाई कोर्ट का नोटिफिकेशन सिविल जजों को कमर्शियल कोर्ट के तौर पर तय करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक बड़ी बेंच को इस टकराव को सुलझाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अधिकार क्षेत्र अलग-अलग राज्यों में जारी किए गए अलग-अलग नोटिफिकेशन पर निर्भर न हो। याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता सिंह निशांत सजय कुमार और विशाल अरुण मिश्रा ने किया।
प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा, प्रेरणा झुनझुनवाला, निहारिका मजूमदार, अंकित राजगढ़िया, आकाश नंदोलिया, सचिन दुबे, विनीता सेजवाल और नमन सोंधी ने किया।
[निर्णय पढ़ें]
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