Supreme Court and Patna High Court  
वादकरण

सुप्रीम कोर्ट में पटना हाईकोर्ट के जजो के घरेलू सहायकों के लिए 40% नौकरी कोटा को चुनौती देते हुए अवमानना ​​याचिका दायर की गई

याचिका में आरोप लगाया गया है कि नियम जजों के घरेलू सहायकों को बिना किसी विज्ञापन या प्रतियोगी चयन प्रक्रिया के नियमित सेवा में शामिल होने की अनुमति देते हैं।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना ​​की एक याचिका दायर की गई है। इसमें उन नियमों को चुनौती दी गई है जिनके तहत पटना हाईकोर्ट में मंजूर रेगुलर मज़दूर पदों में से 40 प्रतिशत पदों पर चीफ जस्टिस या हाईकोर्ट के जजों द्वारा चुने गए या सुझाए गए उम्मीदवारों की नियुक्ति की जा सकती है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह व्यवस्था 'रेणु बनाम डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज, तीस हज़ारी' मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2014 के फैसले का उल्लंघन करती है। इस फैसले में हाई कोर्ट और निचली अदालतों में नियुक्तियों के लिए सार्वजनिक विज्ञापन और पारदर्शी चयन प्रक्रिया अनिवार्य की गई थी।

'रेणु' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि हाई कोर्ट और निचली अदालतों में खाली पदों के लिए आम तौर पर कम से कम दो अखबारों में विज्ञापन दिया जाना चाहिए, जिनमें से एक स्थानीय भाषा का अखबार हो और जिसका प्रसार (circulation) व्यापक हो। कोर्ट ने यह भी कहा था कि बिना तय विज्ञापन प्रक्रिया के की गई नियुक्तियां शुरू से ही अमान्य (void ab initio) होंगी, सिवाय उन नियुक्तियों के जिनके लिए विज्ञापन की आवश्यकता नहीं होती, जैसे कि अनुकंपा के आधार पर की जाने वाली नियुक्तियां।

यह याचिका 'पटना हाई कोर्ट ऑफिसर्स एंड स्टाफ (रिक्रूटमेंट, अपॉइंटमेंट, प्रमोशन एंड अदर कंडीशंस ऑफ सर्विस एंड कंडक्ट) रूल्स, 2021' से संबंधित है, जिसमें इस साल जुलाई और अगस्त में संशोधन किया गया था।

याचिका के अनुसार, 24 जुलाई को अधिसूचित 13वें संशोधन नियमों के तहत, 'पटना हाई कोर्ट जजेज डोमेस्टिक हेल्प (मॉडिफाइड) स्कीम, 2025' के अंतर्गत मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीशों द्वारा चयन या सिफारिश के माध्यम से स्वीकृत 'रेगुलर मज़दूर' (नियमित मज़दूर) के 25 प्रतिशत पदों को भरने की अनुमति दी गई थी।

13 अगस्त को अधिसूचित 14वें संशोधन नियमों ने इस कोटे को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया। याचिका में कहा गया है कि पटना हाई कोर्ट में 'रेगुलर मज़दूर' के 240 पद स्वीकृत हैं।

याचिका के अनुसार,

"बिना सार्वजनिक विज्ञापन के 40% विवेकाधीन सिफारिश कोटा बनाना सीधे तौर पर 'रेणु' मामले के फैसले के पैराग्राफ 35 में दिए गए अनिवार्य निर्देशों का उल्लंघन करता है।"

बाकी 60 प्रतिशत पद सीधी भर्ती के माध्यम से भरे जाने हैं। इस श्रेणी के तहत आवेदन करने वाले उम्मीदवारों का कम से कम आठवीं कक्षा पास होना ज़रूरी है, लेकिन उनकी शैक्षिक योग्यता 12वीं कक्षा से अधिक नहीं होनी चाहिए। उन्हें साइकिल चलाने का ज्ञान और जीवन कौशल (life skills) में दक्षता होनी चाहिए, साथ ही लिखित परीक्षा, कौशल परीक्षा और साक्षात्कार (interview) पास करना होगा।

इसके विपरीत, 40 प्रतिशत कोटे के तहत मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीशों द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों के लिए केवल आठवीं कक्षा पास होना ज़रूरी है। याचिका में कहा गया है कि इस श्रेणी के लिए अन्य परीक्षाएं और पात्रता आवश्यकताएं हटा दी गई हैं।

इसमें आरोप लगाया गया है कि 'मॉडिफाइड डोमेस्टिक हेल्प स्कीम' में विज्ञापन प्रकाशित करने या किसी खुली चयन प्रक्रिया का कोई प्रावधान नहीं है। न्यायाधीशों द्वारा चुने गए घरेलू सहायकों (domestic helps) को 'रेगुलर मज़दूर' के रूप में नियुक्त किया जाता है और वे हाई कोर्ट के नियमित स्टाफ का हिस्सा बन जाते हैं।

याचिका में इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि 'रेगुलर मज़दूर' का पद कई अन्य पदों पर प्रमोशन के लिए एक 'फीडर कैडर' (प्रमोशन का आधार) भी है। इसलिए, याचिकाकर्ता के अनुसार, एंट्री लेवल पर अपारदर्शी नियुक्तियों से कॉम्पिटिटिव प्रोसेस के ज़रिए भर्ती किए गए उम्मीदवारों की सीनियरिटी और प्रमोशन के मौकों पर असर पड़ेगा।

इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की जान-बूझकर अनदेखी करने के लिए बिहार लॉ डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी-कम-लीगल रिमेंब्रेंसर बलराम दुबे और पटना हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल रूपेश देव के ख़िलाफ़ 'कोर्ट की अवमानना' (contempt of court) की कार्रवाई की मांग की गई है।

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Contempt plea filed in Supreme Court challenging 40% job quota in Patna HC for domestic help of judges