दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को राष्ट्रीय राजधानी में आपराधिक मुकदमों के संचालन के लिए सरकारी वकीलों (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) की कमी पर चिंता जताई [मकसूद अहमद बनाम दिल्ली राज्य (NCT)]।
न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने कहा कि सरकारी वकीलों की कमी के कारण आपराधिक मुकदमों और जमानत मामलों के निपटारे पर असर पड़ रहा है।
अदालत ने कहा, "सरकारी वकीलों की कमी एक पुरानी समस्या बन गई है, जिसका आपराधिक मुकदमों और जमानत मामलों के निपटारे पर बहुत बुरा असर पड़ता है। यह कोई नई समस्या नहीं है।"
अदालत ने यह टिप्पणी तब की, जब वह ट्रायल कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने के लिए सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक सुनवाई के दौरान पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) के मौजूद न होने पर दिल्ली के 'डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन' (अभियोजन निदेशक) के वेतन से 5,000 रुपये की लागत (हर्जाना) वसूलने का निर्देश दिया गया था।
अदालत ने कहा कि हालांकि आपराधिक कार्यवाही में देरी को लेकर ट्रायल जज की निराशा समझ में आती है, लेकिन बिना किसी ठोस कदाचार (misconduct) के साबित हुए, 'डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन' को व्यक्तिगत रूप से यह हर्जाना देने के लिए कहना उचित नहीं हो सकता है।
हाईकोर्ट में यह याचिका 'डायरेक्टर ऑफ प्रॉसिक्यूशन' मकसूद अहमद ने दायर की थी। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के 6 अक्टूबर के उस आदेश को चुनौती दी थी, जो 2002 की एक FIR (जिसमें लूट के आरोप थे) से जुड़े आपराधिक मामले में दिया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने राज्य पर 5,000 रुपये का हर्जाना लगाया था, क्योंकि कई बार मौका दिए जाने के बावजूद कोई भी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर सुनवाई के लिए पेश नहीं हुआ। कोर्ट ने निर्देश दिया कि अगर एक हफ्ते के भीतर यह रकम नहीं चुकाई जाती है, तो इसे अहमद के वेतन से काट लिया जाए। साथ ही, जरूरी कार्रवाई के लिए इस आदेश को गृह सचिव (Home Secretary) के पास भेज दिया गया।
हाई कोर्ट ने ट्रायल जज की निराशा को तो समझा, लेकिन बिना किसी ठोस कदाचार के अहमद को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराने पर सवाल उठाया।
अदालत ने कहा, "यह आदेश ट्रायल जज की गहरी निराशा को दिखाता है। उन पर लंबित मामलों (dockets) का भारी बोझ है और उच्च अदालतों की ओर से भी यह उम्मीद की जाती है कि जमानत के मामलों और मुकदमों का जल्द से जल्द निपटारा किया जाए। लेकिन, किसी भी तरह की गड़बड़ी या गलत काम का जिक्र किए बिना, याचिकाकर्ता के वेतन से हर्जाना वसूलने का निर्देश देना, पहली नजर में उचित नहीं लगता है।"
हाईकोर्ट के सामने अहमद ने दलील दी कि सरकारी वकीलों (prosecutors) की भारी कमी है। उन्होंने बताया कि नियमित असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर 21 सितंबर से छुट्टी पर थे, और ट्रायल कोर्ट द्वारा वेतन से पैसे काटने का आदेश देने से पहले उनका पक्ष भी नहीं सुना गया था।
इन दलीलों पर गौर करते हुए, हाई कोर्ट ने अहमद के वेतन से हर्जाना वसूलने के निर्देश पर रोक लगा दी। हालांकि, राज्य पर लगाए गए हर्जाने पर रोक लगाने से अदालत ने इनकार कर दिया।
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि सरकारी वकीलों की कमी को दूर करने के लिए राज्य सरकार ने कोई कदम नहीं उठाए हैं।
अदालत ने कहा, "मेरे सामने ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि राज्य सरकार कोई गंभीर कदम उठा रही है। बल्कि, राज्य ने तो उक्त आदेश को चुनौती तक नहीं दी है। इसलिए, मैं राज्य पर लगाए गए जुर्माने पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हूँ।"
अदालत ने राज्य को अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले विस्तृत जवाब या स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का मौका दिया।
इस मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी, 2027 को होगी।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रमेश गुप्ता और अधिवक्ता हेमंत गुप्ता पेश हुए।
राज्य की ओर से अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) मंजीत आर्य पेश हुए।
[आदेश पढ़ें]
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें