दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) के छह पूर्व और वर्तमान अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के अपने आदेश पर रोक लगा दी है [अशोक कुमार अग्रवाल बनाम सुशील दीवान व अन्य]।
6 अक्टूबर को, जस्टिस मधु जैन ने CBI अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया था। इन अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने एक मामले में पूर्व भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी को आरोपमुक्त (डिस्चार्ज) किए जाने को चुनौती देते समय, सरकार के साथ हुए पत्राचार के बारे में अदालत के सामने झूठे बयान दिए थे।
अदालत ने IRS अधिकारी अशोक कुमार अग्रवाल की याचिका को स्वीकार कर लिया था और विशेष न्यायाधीश (CBI) को निर्देश दिया था कि वे सुशील दीवान, विनीत विनायक, अमित कुमार, रमन त्यागी, प्रेम कुमार गौतम और मोहम्मद आजाद के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज करें।
हालांकि, 3 नवंबर को दिए गए एक आदेश में, जस्टिस मिनी पुष्करणा ने कहा कि इस निर्देश पर फिलहाल रोक रहेगी।
इस मामले की अगली सुनवाई 4 फरवरी, 2027 को होगी।
अदालत ने यह आदेश तब पारित किया जब CBI के दो पूर्व अधिकारियों - सुशील दीवान और रमन त्यागी - ने आदेश को वापस लेने (रिकॉल करने) के लिए आवेदन दायर किए।
आवेदकों ने, जिन्हें CBI का समर्थन प्राप्त था, दलील दी कि यह फैसला उनकी बात सुने बिना सुनाया गया था। अपील में केवल दीवान एक पक्ष थे। उन्होंने दावा किया कि उन्हें गलत ईमेल आईडी पर नोटिस भेजा गया था। बाकी पांच आरोपियों को कभी कोई नोटिस जारी ही नहीं किया गया था।
यह मामला अग्रवाल के खिलाफ CBI द्वारा दर्ज किए गए एक केस से जुड़ा है, जिसमें उन पर अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से कहीं अधिक संपत्ति रखने का आरोप था। जनवरी 2016 में, हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की मंजूरी (सैंक्शन) को अमान्य करार दिया था, जिसके बाद उन्हें आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
इसके बाद CBI ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने पर विचार किया। हालांकि, जून 2016 में कानून और न्याय मंत्रालय ने अपनी राय दी कि इस मामले को आगे बढ़ाने का कोई ठोस आधार नहीं है। कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने जुलाई 2016 में CBI को यह राय बता दी।
बाद में, जब अग्रवाल ने जांच के दौरान जब्त किए गए दस्तावेजों को वापस मांगा, तो CBI ने 2 अगस्त 2016 के अपने जवाब में कहा कि आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर मंत्रालय के साथ बातचीत (पत्राचार) "चल रही है"।
हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि ऐसी कोई बातचीत नहीं चल रही थी। इसके बजाय, CBI आंतरिक रूप से यह विचार कर रही थी कि क्या इस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की जाए और कोई और कानूनी राय ली जाए।
अदालत ने CBI के जवाब के अलग-अलग ड्राफ्ट देखे और पाया कि एक शुरुआती ड्राफ्ट में साफ तौर पर लिखा था कि DoPT ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। बाद में इस बात को हटा दिया गया और उसकी जगह हाथ से लिखा गया एक बयान जोड़ दिया गया कि मंत्रालय के साथ बातचीत चल रही है।
अदालत ने माना कि यह बदलाव केवल "शब्दों के गलत चयन" का मामला नहीं था। अदालत को इस आरोप के पीछे एक "ठोस आधार" मिला कि अदालत के सामने एक झूठा बयान पेश किया गया था, और यह भी माना कि "न्याय के हित में" इस मामले की जांच करना "जरूरी" है।
अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि CBI ने बाद में 9 अगस्त 2016 के अपने जवाब में स्थिति को सुधार लिया था, या यह कि अग्रवाल को इससे कोई नुकसान नहीं हुआ था।
अदालत ने कहा, “जवाब तैयार करने, उसमें बदलाव करने, उसकी जांच-परख करने, उसे प्रोसेस करने, मंजूरी देने और दाखिल करने की पूरी प्रक्रिया, और साथ ही पिछले ड्राफ्ट व फाइल-नोटिंग से सामने आई जानकारी, प्रथम दृष्टया यह मानने का एक ठोस आधार देती है कि संबंधित अधिकारियों ने एक ऐसा दावा आगे बढ़ाने में हिस्सा लिया, जिसके बारे में उन्हें पता था कि यह मौजूदा स्थिति के विपरीत है। ये परिस्थितियां केवल किसी पक्ष द्वारा अपना तर्क साबित न कर पाने से कहीं अधिक गंभीर बात को दर्शाती हैं।”
इसलिए, अदालत ने अग्रवाल की याचिका स्वीकार कर ली और शिकायत दर्ज करने का निर्देश दिया।
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