दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने खिलाफ चल रहे अदालत की अवमानना के मामले में "बिना शर्त और पूरी तरह से" माफी मांगी है। यह मामला 10 अक्टूबर को दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के विरोध प्रदर्शन के दौरान लगाई गई पाबंदियों से जुड़ा है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की बेंच के सामने - जिसमें जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची शामिल थे - दायर दो हलफनामों में कुमार ने कहा कि कोर्ट के निर्देशों का "कोई उल्लंघन नहीं हुआ है, जानबूझकर या सोच-समझकर किए गए उल्लंघन की तो बात ही छोड़ दें।" उन्होंने अपने खिलाफ जारी अवमानना नोटिस को रद्द करने की मांग की।
अवमानना याचिका में आरोप लगाया गया है कि मेट्रो स्टेशनों, खासकर GTB नगर और विश्वविद्यालय (विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन) के एंट्री और एग्जिट गेट बंद करके कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का उल्लंघन किया गया है। 9 और 11 अक्टूबर को कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मेट्रो सेवाएं सामान्य रूप से चलें, इंटरनेट सुविधाएं "बिना किसी रुकावट के काम करें", बैरिकेड्स की समीक्षा की जाए, और धारा 163 BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) वाले इलाकों के बाहर शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने वाले लोगों को अवैध रूप से हिरासत में न लिया जाए। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट परिसर से धारा 163 का नोटिस बोर्ड हटाने का भी आदेश दिया था।
अनुपालन हलफनामे (compliance affidavit) में कुमार ने कहा कि "इंटरनेट सुविधाएं बिना किसी रुकावट के काम कर रही थीं, और कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए केवल मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को ही सस्पेंड किया गया था।" जवाबी हलफनामे में यह भी कहा गया है कि ऐसा पुलिस के अनुरोध पर केंद्र सरकार द्वारा रायसीना हिल के चार किलोमीटर के दायरे में किया गया था।
मेट्रो सेवाओं के बारे में पुलिस ने बताया कि शुरुआत में 57 स्टेशनों पर आवाजाही को नियंत्रित किया गया था। 9 अक्टूबर के आदेश के बाद, इसे घटाकर 45 स्टेशनों तक सीमित कर दिया गया - जो पूरे नेटवर्क के 303 स्टेशनों का "लगभग 15% हिस्सा" है। 10 अक्टूबर की रात 10 बजे मेट्रो सेवाएं सामान्य हो गईं।
हलफनामे में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट परिसर के अंदर विरोध-प्रदर्शन के खिलाफ कोई चेतावनी नोटिस नहीं लगाया गया था। इसमें यह भी जोड़ा गया है कि कोर्ट परिसर को "विरोध-प्रदर्शन की जगह के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
लोगों को हिरासत में लेने के संबंध में पुलिस ने कहा कि दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 172 के तहत केवल उन्हीं जगहों से लोगों को हटाया गया, जहां धारा 163 के आदेश लागू थे। पुलिस के अनुसार, जिन लोगों को हटाया गया, उन्हें "अस्थाई केंद्रों" में रखा गया, जहां उन्हें "गरमागरम, ताज़ा और अच्छा खाना" दिया गया और दो से छह घंटे के भीतर छोड़ दिया गया। आयुक्त ने दावा किया कि राजनीतिक नेताओं को SHO के कक्ष में बैठाया गया और उन्हें "चाय, कॉफी, भोजन और अन्य जलपान" दिए गए।
जवाब-हलफनामे में आगे कहा गया है कि CJP को 20 जून को जंतर-मंतर पर एक दिन के विरोध-प्रदर्शन की अनुमति मिली थी, लेकिन उन्होंने इसे 36 दिनों तक जारी रखा। 20 जुलाई को, उन्होंने बिना अनुमति के "चलो संसद" मार्च निकाला, जिसमें 1,000 प्रदर्शनकारियों की सहमति के विपरीत "35,000 से अधिक" लोग शामिल हुए। पुलिस का दावा है कि इस दौरान 240 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए।
इसमें 6, 7 और 8 अक्टूबर को हुए कांग्रेस के विरोध-प्रदर्शनों का भी जिक्र है। आरोप है कि इन प्रदर्शनों को "फ्रीलांस पत्रकारिता" की आड़ लेने वाले लोगों ने बढ़ावा दिया था।
पुलिस ने CJP के 7 अक्टूबर के पत्र को केवल एक "सूचना" माना और 9 अक्टूबर को इसे खारिज कर दिया। उसी दिन, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को पत्र लिखा। उन्होंने "विश्वसनीय खुफिया जानकारी" का हवाला देते हुए बताया कि CJP "कानूनी आदेशों का उल्लंघन" करने की योजना बना रहा है, और एहतियाती कदम उठाने के निर्देश दिए।
कुमार ने इस हलफनामे को एक अंतरिम जवाब बताया। उन्होंने कहा कि "समय की कमी" के कारण, इसमें अन्य लंबित याचिकाओं पर बात नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्रवाई को लेकर "एक गलत नैरेटिव (धारणा) फैलाने की कोशिश की जा रही है।"
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Detained protestors were served fresh, hot meals: Delhi Police Commissioner to Supreme Court