Murder (representational)  
वादकरण

क्या बीमा दावे के लिए गैंगस्टरों द्वारा की गई हत्या को दुर्घटनावश मृत्यु माना जा सकता है? पंजाब उपभोक्ता आयोग ने दिया जवाब

आयोग पंजाब में गैंगस्टरों द्वारा कथित तौर पर मारे गए एक व्यक्ति के परिवार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था।

Bar & Bench

पंजाब राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने हाल ही में यह माना है कि गैंगस्टरों द्वारा की गई पूर्व-नियोजित हत्या को, केवल इसलिए कि यह हत्या जानबूझकर की गई थी, किसी बीमा पॉलिसी के तहत 'दुर्घटना से हुई मौत' (एक्सीडेंटल डेथ) के कवरेज से अपने आप बाहर नहीं किया जा सकता।

पीठासीन न्यायिक सदस्य एचपीएस महाल और सदस्य किरण सिबल की पीठ ने कहा कि हमलावरों का हत्या करने का इरादा और क्या इससे हुई मौत को बीमा के उद्देश्यों के लिए 'दुर्घटना' माना जा सकता है, ये दोनों अलग-अलग सवाल हैं।

आयोग ने कहा, "सिर्फ इसलिए कि मौत एक पूर्व-नियोजित आपराधिक कृत्य के कारण हुई है, यह मान लेना सही नहीं होगा कि पॉलिसी के तहत क्लेम का भुगतान नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पॉलिसी में ऐसी कोई शर्त या नियम न हो।"

यह मामला तजिंदर सिंह से जुड़ा है, जिनकी 14 जुलाई 2020 को पंजाब के मोगा में उनकी दुकान पर बैठे समय अज्ञात हमलावरों ने हत्या कर दी थी।

सिंह ने लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (LIC) से चार जीवन बीमा पॉलिसी ली थीं, जिनमें 'डबल एक्सीडेंट बेनिफिट' (दोहरा दुर्घटना लाभ) शामिल था। इन पॉलिसियों के तहत कुल 'बेसिक सम एश्योर्ड' (बीमा राशि) 26.6 लाख रुपये थी।

उनकी मौत के बाद, LIC ने बेसिक डेथ बेनिफिट (मृत्यु लाभ) तो दे दिया, लेकिन अतिरिक्त 'एक्सीडेंटल डेथ बेनिफिट' (दुर्घटना मृत्यु लाभ) देने से इनकार कर दिया।

बीमा कंपनी का कहना था कि सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री और पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट के आधार पर की गई जांच से पता चलता है कि इलाके में दहशत फैलाने के लिए गैंगस्टर सुखप्रीत सिंह उर्फ ​​'सुखा गिल लाम्मे' ने एक पूर्व-नियोजित हमले में तजिंदर सिंह की हत्या की थी।

LIC ने तर्क दिया कि चूंकि यह हत्या पूर्व-नियोजित थी, इसलिए इसे 'दुर्घटना' (एक्सीडेंटल डेथ) नहीं माना जा सकता।

मोगा जिला उपभोक्ता आयोग ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और नवंबर 2022 में परिवार की शिकायत खारिज कर दी।

हालांकि, राज्य आयोग ने कहा कि LIC यह साबित करने में विफल रही कि तजिंदर सिंह किसी ऐसी गतिविधि में शामिल थे, जिसके कारण उनकी हत्या हुई।

LIC ने आरोपी गैंगस्टर की एक कथित सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला दिया था, जिसमें उसने दावा किया था कि सिंह के साथ उसका कोई विवाद था।

आयोग ने गौर किया कि इस आरोप की पुष्टि न तो FIR से होती है और न ही पुलिस की जांच रिपोर्ट से।

आयोग ने LIC के 2007 के एक सर्कुलर का भी जिक्र किया, जो हत्या के मामलों में 'एक्सीडेंटल डेथ बेनिफिट' को रोकने पर रोक लगाता है—बशर्ते पुलिस रिकॉर्ड में ऐसा कोई संदेह न हो कि हत्या खुद पीड़ित द्वारा उकसाए जाने के कारण हुई है या इसमें क्लेम करने वाले (दावेदार) की कोई मिलीभगत है।

आयोग ने माना कि LIC ने बहुत ही संकीर्ण और तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया है, जबकि उसने ऐसा कोई 'एक्सक्लूजन क्लॉज' (पॉलिसी से बाहर रखने वाली शर्त) पेश नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि यह मौत बीमा कवरेज के दायरे में नहीं आती है। परिणामस्वरूप, इसने जिला आयोग के आदेश को रद्द कर दिया और LIC को निर्देश दिया कि वह सभी चार पॉलिसियों के तहत अतिरिक्त दुर्घटना लाभ का भुगतान करे, जिसमें 30 अप्रैल, 2021 से 6% वार्षिक ब्याज भी शामिल हो।

इसके अलावा, मुआवजे और मुकदमे के खर्च के तौर पर ₹50,000 देने का भी आदेश दिया गया।

शिकायतकर्ताओं की ओर से वकील लिज़ा बंसल पेश हुईं।

LIC की ओर से वकील संदीप भारद्वाज पेश हुए।

[फैसला पढ़ें]

Ripendeep_Kaur_Vs_LIC.pdf
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