सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सवाल किया कि स्पष्ट नियमों के अभाव में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने शिवसेना के 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न को दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को देने से इनकार क्यों नहीं किया।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच शिवसेना में फूट से जुड़ी चुनौतियों पर सुनवाई कर रही थी। इन चुनौतियों में ECI का एकनाथ शिंदे गुट को आधिकारिक पार्टी के तौर पर मान्यता देने का फ़ैसला और महाराष्ट्र विधानसभा स्पीकर का पाला बदलने वाले विधायकों को अयोग्य न ठहराने का फ़ैसला शामिल था।
कोर्ट ने यह सवाल तब पूछा जब शिंदे गुट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट नीरज किशन कौल ने ECI के उस फ़ैसले का बचाव किया जिसमें उसने लेजिस्लेटिव बहुमत (विधायी बहुमत) को आधार बनाया था।
जस्टिस बागची ने कहा, "अगर सभी टेस्ट (तरीके) सही नहीं थे, तो उनके पास हमेशा यह विकल्प था कि वे इनमें से किसी भी गुट को फ़ायदा न दें। उन्हें अपने चुनाव चिह्न खुद चुनने दें और अपनी ताकत पर चुनाव लड़ने दें, न कि बालासाहेब की ताकत पर।"
जज ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि दसवीं अनुसूची के तहत कार्यवाही अलग-अलग विधायकों के आचरण से जुड़ी होती है, जबकि आरक्षित चुनाव चिह्न को लेकर विवाद राजनीतिक दल से जुड़ा होता है।
जस्टिस बागची ने कहा, "चुनाव चिह्न का टेस्ट राजनीतिक दल के लिए होता है, जबकि अयोग्यता विधानसभा में विधायक के काम से जुड़ी होती है। चुनाव चिह्न का टेस्ट लेजिस्लेटिव पार्टी (विधायी दल) के लिए नहीं हो रहा है। यह राजनीतिक दल का होता है।"
कौल ने दलील दी कि ECI ने इन खास हालात में लेजिस्लेटिव बहुमत को ही एकमात्र व्यावहारिक टेस्ट मानने से पहले शिवसेना के संविधान, उसके संगठनात्मक ढांचे और विरोधी गुटों को मिले समर्थन की जांच की थी।
उन्होंने कहा कि संगठनात्मक ढांचे में नॉमिनेटेड सदस्यों का दबदबा था, यह पार्टी कार्यकर्ताओं की इच्छा को सही ढंग से नहीं दिखाता था और इसमें पक्ष प्रमुख (पार्टी प्रमुख) के पास असीमित अधिकार थे। उन्होंने कहा कि बड़े स्तर पर कार्यकर्ताओं के समर्थन की गिनती करना भी व्यावहारिक नहीं था, जबकि चुने हुए प्रतिनिधि बंटे हुए थे।
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