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वादकरण

मद्रास हाईकोर्ट ने उस व्यक्ति के खिलाफ पशु क्रूरता का मामला रद्द किया, जिस पर काटने वाले कुत्ते पर पत्थर फेंकने का आरोप था

उस व्यक्ति ने दावा किया कि जानवरों के साथ क्रूरता का यह मामला, उसके पड़ोसी के खिलाफ की गई उस शिकायत का जवाब था जिसमें पड़ोसी ने अपने पालतू कुत्ते को उसे काटने के लिए उकसाया था।

Bar & Bench

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज जानवरों के प्रति क्रूरता का मामला रद्द कर दिया। उस व्यक्ति पर आरोप था कि उसने अपने पड़ोसी के पालतू कुत्ते पर पत्थर फेंका था, क्योंकि कुत्ते ने कथित तौर पर उसे काटकर घायल कर दिया था [बालाजी बनाम राज्य]।

जस्टिस GK इलानथिरायन ने पाया कि पुलिस ने अधिकार-क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट से ज़रूरी पूर्व अनुमति लिए बिना ही एक ऐसे अपराध की जांच की थी, जिसमें बिना वारंट के गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता (non-cognisable offence); जबकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 174(2) के तहत ऐसी अनुमति लेना ज़रूरी है।

Justice GK Ilanthiraiyan

कोर्ट बालाजी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। बालाजी ने अपने पड़ोसी के पालतू कुत्ते पर कथित तौर पर पत्थर फेंकने के आरोप में दर्ज पशु क्रूरता का मामला रद्द करने की मांग की थी।

बालाजी और कुत्ते के मालिक, देवराज मणिक्कम, पड़ोसी थे और उनके बीच पहले से ही झगड़े चल रहे थे।

बालाजी का आरोप था कि जब भी वह सड़क से गुजरते थे, मणिक्कम जानबूझकर अपने कुत्ते को उन पर छोड़ देता था। आखिरकार कुत्ते ने बालाजी के पैर में काट लिया और उन्हें गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

पीरकानकरनई पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 291 (किसी के कब्जे वाले जानवर के संबंध में लापरवाही भरा व्यवहार) के तहत मणिक्कम के खिलाफ मामला दर्ज किया।

इसके बाद मणिक्कम ने शिकायत की कि बालाजी ने उसके कुत्ते पर पत्थर फेंका था। इस शिकायत के आधार पर, पुलिस ने एक और FIR दर्ज की और 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960' की धारा 11(1)(a) के तहत बालाजी पर आरोप लगाए।

बालाजी ने मामला रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने तर्क दिया कि पशु क्रूरता की कार्यवाही मणिक्कम के खिलाफ उनकी पिछली शिकायत के जवाब में की गई जवाबी कार्रवाई थी।

कोर्ट ने गौर किया कि ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि कथित पत्थरबाजी के कारण कुत्ते को कोई चोट लगी थी।

दूसरी ओर, बालाजी ने मेडिकल रिकॉर्ड और तस्वीरें पेश कीं जो इस बात का समर्थन करती थीं कि कुत्ते ने उन्हें काटा था।

कोर्ट ने आगे कहा कि 'पशु क्रूरता निवारण अधिनियम' की धारा 11(1)(a) के तहत अपराध 'नॉन-कॉग्निजेबल' (जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकती) था। इसलिए, पुलिस संबंधित कोर्ट से अनुमति लिए बिना FIR दर्ज नहीं कर सकती थी और न ही आरोपों की जांच कर सकती थी।

हालांकि, पुलिस ने ऐसी अनुमति लिए बिना ही पशु क्रूरता की FIR दर्ज की, जांच पूरी की और अंतिम रिपोर्ट दाखिल कर दी। कोर्ट ने यह भी पाया कि मजिस्ट्रेट ने प्रक्रियात्मक खामी पर ध्यान दिए बिना ही मामले का संज्ञान ले लिया और बालाजी को समन जारी कर दिया।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला, "इसे देखते हुए, पूरी कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।"

इसलिए, कोर्ट ने बालाजी के खिलाफ दर्ज मामला रद्द कर दिया।

बालाजी का पक्ष वकील ए. अश्विनकुमार ने रखा। राज्य की ओर से वकील आर. गणेश कुमार पेश हुए।

[फ़ैसला पढ़ें]

Balaji_Vs_State.pdf
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Madras HC quashes animal cruelty case against man accused of pelting stone at dog that bit him