मद्रास हाई कोर्ट ने सोमवार को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और DMK नेता के.एन. नेहरू द्वारा दायर एक पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटिशन) को खारिज कर दिया। इस याचिका में कोर्ट के उस पहले के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें नगर प्रशासन और जलापूर्ति विभाग में कथित 'नौकरी के बदले पैसे' (कैश-फॉर-जॉब्स) घोटाले के संबंध में FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था [के.एन. नेहरू बनाम इनबदुरई]।
मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत के 20 फरवरी के आदेश पर पुनर्विचार करने की मांग की गई थी। इस आदेश में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा साझा की गई सामग्री के आधार पर सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (DVAC) को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
यह कार्यवाही नेहरू और राज्य सरकार द्वारा मद्रास उच्च न्यायालय के 20 फरवरी, 2026 के आदेश के खिलाफ दायर की गई पुनर्विचार याचिकाओं (review petitions) से शुरू हुई।
इस आदेश में DVAC को नगर प्रशासन और जल आपूर्ति विभाग में भर्ती के दौरान हुई कथित अनियमितताओं के संबंध में FIR दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
यह मूल आदेश AIADMK के राज्यसभा सांसद IS इनबदुरई द्वारा दायर एक याचिका पर पारित किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि राज्य पुलिस ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा दी गई उस जानकारी पर कोई कार्रवाई नहीं की, जिसमें 2,538 सरकारी पदों पर भर्ती के दौरान 634 करोड़ रुपये के 'नौकरी के बदले पैसे' (cash-for-jobs) घोटाले का जिक्र था।
अपनी पुनर्विचार याचिका में, नेहरू ने तर्क दिया कि उच्च न्यायालय ने उनका पक्ष सुने बिना ही यह निर्देश जारी कर दिया, जबकि ये आरोप उनके नगर प्रशासन मंत्री रहने के कार्यकाल से जुड़े थे। उन्होंने कहा कि यह आदेश 'प्राकृतिक न्याय' (natural justice) के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और इस पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
उस समय DMK के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने भी इस आदेश पर पुनर्विचार की मांग की थी। इस बीच, इनबदुरई ने FIR दर्ज करने के निर्देश का पालन न करने का आरोप लगाते हुए DVAC अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना (contempt) की कार्यवाही शुरू कर दी।
तमिलनाडु में सरकार बदलने के बाद इस विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया। जून 2026 में, राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय को सूचित किया कि DVAC ने FIR दर्ज कर ली है और नई सरकार पिछली सरकार द्वारा दायर की गई पुनर्विचार याचिका को वापस लेना चाहती है।
नेहरू ने राज्य सरकार के इस बदले हुए रुख का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि राज्य में सत्ताधारी राजनीतिक दल के बदलने मात्र से पहले लिए गए कानूनी रुख को छोड़ना उचित नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, पुनर्विचार कार्यवाही की स्वीकार्यता (maintainability) पर भी सवाल उठाए गए। यह भी पूछा गया कि क्या FIR दर्ज करने का निर्देश देने से पहले, जिस व्यक्ति पर आरोप लग सकता है, उसे अपनी बात रखने का मौका मिलना चाहिए।
उच्च न्यायालय ने कार्यवाही के दौरान स्पष्ट किया कि उसके फरवरी के आदेश में केवल कथित अपराधों के संबंध में मामला दर्ज करने के लिए कहा गया था, और इसमें विशेष रूप से नेहरू के खिलाफ FIR दर्ज करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया था।
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Madras High Court dismisses KN Nehru's review plea against order for FIR in cash-for-jobs case