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वादकरण

कोर्ट वीडियो का दुरुपयोग संस्था की छवि को नुकसान पहुंचा रहा है:सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सभी हितधारको के विचार जुटाने को कहा

कोर्ट ने कहा कि निजी प्रचार और पेशेवर फ़ायदे के लिए लाइव-स्ट्रीम की गई कार्यवाही को अपलोड किया जा रहा है।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कमर्शियल फ़ायदे के लिए कोर्ट की सुनवाई की लाइव-स्ट्रीमिंग के गलत इस्तेमाल पर अफ़सोस जताया और कहा कि इससे न्यायपालिका की संस्था को नुकसान पहुँचा है [हर्षिता ग्रोवर बनाम भारत संघ और अन्य]।

कोर्ट ने कहा,

"आपको अंदाज़ा भी नहीं है कि इससे 'बार और बेंच' को कितना नुकसान हुआ है... खुद इस संस्था को..."

आखिरकार, कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता से कहा कि वे इस समस्या से निपटने के तरीकों पर हाई कोर्ट और दूसरे संबंधित पक्षों से सुझाव इकट्ठा करें। कोर्ट ने आदेश दिया,

"पक्षों और दूसरे संबंधित लोगों से मिले सुझाव भारत के सॉलिसिटर जनरल के ऑफिस को भी भेजे जाएं। अब तक मिले सुझावों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए प्रस्ताव के साथ काउंटर-एफिडेविट (जवाब) दाखिल करने के लिए समय दिया जाता है।"

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच एक ऐसी याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो को बिना इजाज़त निकालने और उनसे पैसे कमाने पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

इससे पहले, बेंच ने एक अंतरिम आदेश जारी करके सोशल मीडिया और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिना पूर्व अनुमति के लाइव-स्ट्रीम की गई कोर्ट की कार्यवाही के अनधिकृत इस्तेमाल या प्रसार पर रोक लगा दी थी। कोर्ट ने याचिका पर सभी राज्यों को नोटिस जारी कर उनसे जवाब भी मांगा था। केंद्र सरकार से कहा गया था कि वह जांच करे कि क्या याचिका में की गई मांगों को लागू किया जा सकता है।

बाद में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट की कार्यवाही की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाला उसका आदेश मान्यता प्राप्त समाचार संगठनों को सुनवाई की रिपोर्टिंग करने से नहीं रोकता है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जहां कोर्टरूम रिपोर्टिंग पर कोई असर नहीं पड़ेगा, वहीं मान्यता प्राप्त समाचार आउटलेट्स को उसके पहले के अंतरिम आदेश के तहत लगाई गई पाबंदियों का पालन करना जारी रखना होगा।

CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana

आज वकील मैथ्यूज नेडुम्पारा ने तर्क दिया कि लोगों को यह जानने का अधिकार है कि अदालत में क्या हो रहा है। SG ने बताया कि कुछ YouTube चैनल भी कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो अपलोड कर रहे हैं। वकील प्रशांत भूषण ने इस बात पर ज़ोर दिया कि केंद्र सरकार ने अभी तक इस मामले में अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। इसके बाद SG ने कहा,

"मुझे नहीं लगता कि उन YouTube चैनलों को कोर्ट की कार्यवाही अपलोड करने से रोकने के निर्देश देने का कोई विरोध होना चाहिए।"

नेडुम्पारा ने ज़ोर देकर कहा कि सरकार लोगों की राय को दबा नहीं सकती।

CJI कांत ने जवाब दिया,

"कोर्ट की कार्यवाही का कमर्शियल इस्तेमाल हो रहा है, जबकि इसका मकसद लोगों को कार्यवाही दिखाना, उन्हें कार्यवाही समझाना और कोर्ट में क्या होता है, इसके बारे में बेहतर जानकारी देना है। कुछ चैनल इन कार्यवाहियों का कमर्शियल इस्तेमाल कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि हम उन्हें नहीं रोकेंगे? हम सिर्फ़ इसलिए यहाँ हैं ताकि यह तय किया जा सके कि कोर्ट की कार्यवाही का कमर्शियल इस्तेमाल न हो। जो चीज़ जनहित के लिए है, उसका कमर्शियल इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इससे उस मकसद का ही नुकसान होगा।"

उन्होंने आगे कहा,

"जजों की बातों को गलत तरीके से बताना या गलत अर्थ निकालना लाइव स्ट्रीमिंग का मकसद नहीं है। रिपोर्टिंग निष्पक्ष और सटीक होनी चाहिए, और ऐसे गलत इस्तेमाल से निपटने का एक तरीका है।"

जस्टिस बागची ने कहा,

"पहली बात, बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया वकीलों को पेशेवर फ़ायदे के लिए प्रचार करने से रोकती है। आज, कोर्ट की कार्यवाही का ज़्यादातर अपलोडिंग निजी प्रचार और पेशेवर फ़ायदे के लिए किया जा रहा है। यह एक बहुत गंभीर मुद्दा है। हम लाइव-स्ट्रीम की गई कार्यवाही से जुड़े डेटा को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त स्टोरेज स्पेस (चाहे क्लाउड स्टोरेज हो या कुछ और) की व्यवस्था करने की प्रक्रिया में हैं। उस सामग्री को RTI सहित उचित तरीकों से उपलब्ध कराया जा सकता है।

लेकिन जब हम कार्यवाही की लाइव-स्ट्रीमिंग करते हैं, तो तकनीकी सीमाओं के कारण, किसी को लाइव स्ट्रीम के कुछ हिस्सों को निकालने, उन्हें निजी प्रोफ़ाइल पर अपलोड करने और पेशेवर फ़ायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से रोकने का कोई प्रभावी नियम नहीं है। यह वकालत और कानूनी पेशे के सिद्धांतों के पूरी तरह से खिलाफ़ है।"

सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने अपनी बात रखते हुए कहा,

"सुनवाई 30 मिनट की है, लेकिन उसका सिर्फ़ चार मिनट का हिस्सा ही अपलोड किया गया है। अपलोड किए गए वीडियो में ऐसी चीज़ें हो सकती हैं जिनका कार्यवाही से कोई लेना-देना न हो... मेरे दो सुझाव हैं। पहला, अगर कोर्ट की कार्यवाही को दोबारा दिखाया जा रहा है, तो उसे पूरा दिखाया जाना चाहिए। दूसरा, इसमें कोई टाइटल या डिस्क्रिप्शन नहीं जोड़ा जाना चाहिए। YouTube पर वीडियो इसी तरह दिखते हैं।"

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Misuse of court videos damaging the institution: Supreme Court asks Centre to collate views of stakeholders