सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की आलोचना की। सरकार ने वेदांता लिमिटेड और रवा ऑयल (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में आए दशकों पुराने विदेशी मध्यस्थता फैसलों (arbitral awards) को लागू होने से रोका था। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इस तरह की कानूनी कार्यवाही से भारत की मध्यस्थता व्यवस्था (arbitration regime) में भरोसा कम होगा। [भारत सरकार बनाम वेदांता]
न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और मनमोहन सिंह की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार के मध्यस्थता निर्णयों को लागू करने के दृष्टिकोण पर सवाल उठाए, जिसमें 2004 और 2016 में पारित निर्णयों को लागू करने की अनुमति दी गई थी।
पीठ ने मध्यस्थता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाया और सम्मेलनों और सेमिनारों में मध्यस्थता पर चर्चाओं का हवाला दिया, जबकि पक्षकार निर्णयों को लागू करने का विरोध करते रहे।
पीठ ने सरकार को चेतावनी दी कि इस तरह के मुकदमे मध्यस्थता प्रक्रिया में विश्वास को कम कर सकते हैं।
यह विवाद कृष्णा-गोदावरी बेसिन में रवा तेल क्षेत्र के विकास के लिए केंद्र सरकार और कंपनियों के एक समूह के बीच 1994 में हुए 'प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट' (उत्पादन साझाकरण अनुबंध) से शुरू हुआ। अनुबंध की व्याख्या को लेकर हुए विवाद के कारण कुआलालंपुर में मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) की प्रक्रिया शुरू हुई। अक्टूबर 2004 में, मध्यस्थ न्यायाधिकरण (आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल) ने एक आंशिक फैसला सुनाया, लेकिन इसमें रकम तय करने (क्वांटिफिकेशन) का मुद्दा अनसुलझा रह गया। बाद में 2011 में, मलेशियाई संघीय अदालत ने इस फैसले को बरकरार रखा।
जुलाई 2014 में, सरकार ने कंपनियों को 'कारण बताओ नोटिस' (शो-कॉज नोटिस) जारी कर उनसे लगभग 99 मिलियन डॉलर की वसूली की मांग की। इसके बाद, अक्टूबर 2016 में एक पुनर्गठित न्यायाधिकरण ने अंतिम फैसला सुनाया। सरकार ने इस फैसले को लागू करने का विरोध किया। सरकार ने इसके लिए समय-सीमा (लिमिटेशन), सार्वजनिक नीति और न्यायाधिकरण के अधिकार समाप्त हो जाने (फंक्टस ऑफिसियो) जैसे तर्क दिए।
1 जुलाई 2026 को, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि फैसले को लागू करने की याचिका समय-सीमा के भीतर है और रकम तय करने (क्वांटिफिकेशन) के मामले में न्यायाधिकरण के पास अधिकार क्षेत्र बना हुआ था। उच्च न्यायालय ने बैंक गारंटी जारी करने का भी निर्देश दिया।
सुनवाई के दौरान, पीठ ने इस विवाद के इतने लंबे समय तक चलने पर सवाल उठाया। पीठ ने गौर किया कि पहला मध्यस्थता फैसला 2004 में आया था, जबकि अंतिम फैसला 2016 में सुनाया गया।
अदालत ने उच्च न्यायालय की उन टिप्पणियों का भी जिक्र किया, जो सरकार द्वारा कंपनियों से पैसे की वसूली के लिए 'कारण बताओ नोटिस' जारी करने के बाद मध्यस्थ न्यायाधिकरण के पुनर्गठन से संबंधित थीं।
अंततः, पीठ को उच्च न्यायालय के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला।
अपील को खारिज करते हुए अदालत ने कहा, "हमारी राय में, उच्च न्यायालय ने अपने फैसले और आदेश में कोई गलती नहीं की है, कानून से जुड़ी गलती की तो बात ही छोड़ दें।"
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी पेश हुए।
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