Medicines AI Image
वादकरण

अस्पतालों को बिलों पर दवाओं की खरीद कीमत बताने का निर्देश देने के खिलाफ कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका

याचिका मे कहा कि खरीद कीमते आपूर्तिकर्ताओं, छूट, क्रेडिट व्यवस्था आदि के आधार पर अलग-अलग होती है और अनिवार्य रूप से जानकारी का खुलासा करने से गोपनीय व्यावसायिक व्यवस्थाएं उजागर हो सकती है।

Bar & Bench

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकारों को एक याचिका पर नोटिस जारी किया। इस याचिका में कर्नाटक सरकार के उस सर्कुलर को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को 1 नवंबर से मरीजों के बिल में दवाओं की अंतिम कीमत के साथ-साथ उनकी खरीद की मूल कीमत (बेस प्रोक्योरमेंट प्राइस) का भी खुलासा करना होगा।

यह याचिका 'प्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन', 'प्रिस्टीन हॉस्पिटल्स एंड रिसर्च सेंटर प्राइवेट लिमिटेड' और एक डॉक्टर, डॉ. हलागेरे मल्लिकार्जुन प्रसन्ना द्वारा दायर की गई है।

जस्टिस सीएम पूनाचा ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, कर्नाटक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, और कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन से जवाब मांगा है।

Justice CM Poonacha

याचिकाकर्ताओं ने कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन आयुक्त द्वारा 1 अक्टूबर को जारी एक परिपत्र (सर्कुलर) को चुनौती दी है।

इस परिपत्र में अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को निर्देश दिया गया है कि वे 1 नवंबर से दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और उपभोग्य सामग्रियों (consumables) के लिए मरीजों को दिए जाने वाले बिलों में, उनकी वास्तविक खरीद कीमत (landing price), MRP और मरीजों से वसूली गई कीमत का अलग-अलग विवरण दें।

यह परिपत्र कीमतों में अधिक पारदर्शिता लाने और अनुचित तरीके से कीमतें बढ़ाए जाने (unfair mark-ups) से बचाव के उद्देश्य से जारी किया गया था।

इसमें यह भी अनिवार्य किया गया है कि बिलिंग काउंटरों और फार्मेसियों पर नोटिस लगाए जाएं, वेबसाइटों पर संबंधित जानकारी प्रकाशित की जाए, और खरीद के इनवॉइस तथा बिलिंग रिकॉर्ड को कम से कम तीन साल तक सुरक्षित रखा जाए।

इस निर्देश में जिला स्वास्थ्य और औषधि नियंत्रण प्राधिकरणों द्वारा इसकी निगरानी और इसे लागू कराने की व्यवस्था भी की गई है।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह परिपत्र बिना किसी कानूनी अधिकार के जारी किया गया है। इसमें ऐसी जानकारी देने की बाध्यता थोपी गई है, जिसका उल्लेख दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और स्वास्थ्य संस्थानों से जुड़े मौजूदा कानूनी ढांचे में कहीं नहीं है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भले ही राज्य का औषधि लाइसेंसिंग प्राधिकरण 'ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940' और 'ड्रग्स रूल्स, 1945' के तहत मामलों को विनियमित (regulate) करने के लिए अधिकृत है, लेकिन ये कानून उसे मरीजों के बिलों में दवाओं की खरीद कीमत (procurement cost) का खुलासा करने का आदेश देने का अधिकार नहीं देते हैं।

उनका यह भी कहना है कि दवाओं की कीमतों को 'ड्रग्स (प्राइसेस कंट्रोल) ऑर्डर, 2013' के तहत नियंत्रित किया जाता है, जिसे 'नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी' (NPPA) संचालित करती है। यह प्राधिकरण MRP सहित कीमतों के कुछ निश्चित मानकों को तो नियंत्रित करता है, लेकिन इसमें मरीजों को दवाओं की खरीद कीमत या बेस प्राइस बताने की कोई आवश्यकता नहीं है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि कर्नाटक ने संविधान के अनुच्छेद 252 के तहत 'क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010' को नहीं अपनाया है। इसके बजाय, राज्य में स्वास्थ्य संस्थानों को 'कर्नाटक प्राइवेट मेडिकल एस्टेब्लिशमेंट्स एक्ट, 2007' के तहत विनियमित किया जाता है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस कानून में मरीजों के बिलों पर दवाओं और उपकरणों की खरीद कीमत (base price) बताने की कोई बाध्यता नहीं है।

याचिकाकर्ताओं ने इस परिपत्र के उस आधार पर भी सवाल उठाए हैं, जिसमें 'लीगल मेट्रोलॉजी एक्ट' और 'ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स' द्वारा जारी अस्पताल बिलिंग मानकों का हवाला दिया गया है।

उनका तर्क है कि इनमें से कोई भी कानून अस्पतालों को मरीजों के सामने खरीद कीमतों का खुलासा करने के लिए बाध्य करने का कानूनी आधार नहीं देता है। याचिका के अनुसार, खरीद की कीमतें आपूर्तिकर्ताओं, खरीदी गई मात्रा, छूट, रिबेट, क्रेडिट की शर्तों और अन्य व्यावसायिक नियमों के आधार पर अलग-अलग होती हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी जानकारी का अनिवार्य रूप से खुलासा करने से गोपनीय व्यावसायिक समझौते उजागर हो सकते हैं। साथ ही, अगर अलग-अलग संस्थानों में खरीद की कीमतें अलग-अलग होंगी, तो इससे मरीजों के बीच भ्रम पैदा हो सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने इसे लागू करने के लिए दिए गए बहुत कम समय पर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि इन नियमों का पालन करने के लिए अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों को अपने बिलिंग सॉफ्टवेयर, अकाउंटिंग सिस्टम, खरीद के रिकॉर्ड और प्रशासनिक कामकाज के तरीकों में बदलाव करना होगा।

उनका यह भी आरोप है कि प्रस्तावित नियमों के परिचालन और वित्तीय प्रभावों के बावजूद, यह सर्कुलर अस्पतालों, नर्सिंग होम, फार्मेसियों या अन्य संबंधित पक्षों से पर्याप्त परामर्श किए बिना जारी किया गया था।

याचिका में बताया गया है कि 'फेडरेशन ऑफ हेल्थकेयर एसोसिएशन्स ऑफ कर्नाटक' ने 13 और 14 अक्टूबर को राज्य सरकार को ज्ञापन सौंपकर इस सर्कुलर को वापस लेने की मांग की थी। हालांकि, बाद में दिए गए ज्ञापनों और सरकारी अधिकारियों के साथ हुई बैठकों के बावजूद इसे वापस नहीं लिया गया। इसके बाद, याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और इस सर्कुलर को रद्द करने की मांग की।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील लोमेश किरण एन, ट्विंकल जे. चडवा, प्रशस्ति भट, अजय टी.के. और प्रज्वल वी. पैरवी कर रहे हैं। उन्हें 'सिरिल अमरचंद मंगलदास' की एक टीम का सहयोग प्राप्त है।

और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें


Plea in Karnataka HC against direction to hospitals to disclose procurement price of medicines on bills