Supreme Court, Jail  
वादकरण

विचाराधीन कैद को बिना मुकदमे के सजा में नहीं बदला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने राजस्थान के 'जल जीवन मिशन' के तहत 979.45 करोड़ रुपये के ठेकों से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में दो आरोपियों को जमानत दे दी।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फिर से स्पष्ट किया कि किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को मुकदमे से पहले लंबे समय तक हिरासत में रखना, बिना मुकदमे के सजा देने के बराबर नहीं हो सकता [महेश चंद्र जोशी बनाम राजस्थान राज्य]।

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने कहा कि मुकदमे से पहले की ऐसी लंबी और अनिश्चितकालीन हिरासत, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के अधिकार को कमजोर करेगी।

अदालत ने कहा, "जैसा कि इस अदालत ने बार-बार जोर दिया है, मुकदमे से पहले की लंबी हिरासत को 'बिना मुकदमे के सजा' में नहीं बदला जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विचाराधीन कैदी को मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।"

Justices Dipankar Datta and Sheel Nagu
मुकदमे से पहले की लंबी हिरासत को, बिना मुकदमे के दी जाने वाली सजा में तब्दील नहीं होने दिया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने 16 अक्टूबर के एक आदेश में यह टिप्पणी की। इस आदेश के जरिए राजस्थान के 'जल जीवन मिशन' के तहत 979.45 करोड़ रुपये के ठेके हासिल करने के लिए कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को जमानत दी गई।

अदालत ने माना कि इस मामले में लगाए गए आरोप गंभीर हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर किसी आरोपी को अनिश्चित काल तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी की, "आरोप चाहे कितने भी गंभीर क्यों न हों, वे जमानत देने से जुड़े अन्य सभी पहलुओं को दरकिनार नहीं कर सकते और न ही मुकदमे से पहले किसी को अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने को सही ठहरा सकते हैं।"

यह मामला राजस्थान के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (Public Health Engineering Department) द्वारा जारी किए गए टेंडरों में कथित अनियमितताओं को लेकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (Anti-Corruption Bureau) की जांच से सामने आया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, दो फर्मों - 'श्री गणपति ट्यूबवेल कंपनी' और 'श्री श्याम ट्यूबवेल कंपनी' - ने 2021 से 2023 के बीच टेंडरों में हिस्सा लेने के लिए फर्जी 'काम पूरा होने के प्रमाण पत्र' (work-completion certificates) और 'स्वीकृति पत्र' (letters of acceptance) का इस्तेमाल किया। ये दस्तावेज कथित तौर पर 'इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड' (IRCON International Limited) के नाम से जारी किए गए थे।

अभियोजन पक्ष का आरोप है कि इन फर्मों ने 104 वर्क ऑर्डर हासिल करने के लिए सरकारी कर्मचारियों और निजी व्यक्तियों के साथ मिलीभगत की। इस मामले में 30 अक्टूबर 2024 को एक FIR दर्ज की गई थी।

इसके बाद जोशी और पाठक को गिरफ्तार कर लिया गया। राजस्थान उच्च न्यायालय ने 13 अगस्त 2026 को उनकी नियमित जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं, जिसके बाद उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि एक जन कल्याणकारी परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं और मिलीभगत के आरोप गंभीर हैं। हालांकि, अदालत को ऐसी कई परिस्थितियां मिलीं जो जमानत के पक्ष में थीं।

अदालत ने बताया कि दोनों अपीलकर्ताओं के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।

चूंकि दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत पहले ही जब्त किए जा चुके हैं, इसलिए पीठ ने कहा कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ का खतरा काफी कम हो गया है। अदालत ने माना कि अब हिरासत में रखकर पूछताछ करने या कोई और रिकवरी करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

पीठ ने उनके जेल में बिताए गए समय पर भी गौर किया। लगभग 72 वर्षीय जोशी इस मामले में पांच महीने से अधिक समय तक हिरासत में रहे, जबकि पाठक लगभग आठ महीने तक जेल में रहे।

अदालत ने यह भी बताया कि इन्हीं आरोपों से जुड़े अन्य मामलों में दोनों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। मुकदमे में लगने वाले संभावित समय पर विचार करते हुए, कोर्ट ने मामले के विशाल रिकॉर्ड को ध्यान में रखा। इसमें 22 आरोपी, तीन चार्जशीट, अभियोजन पक्ष के 124 गवाह और 192 दस्तावेज शामिल हैं, जो कुल मिलाकर 20,000 से अधिक पन्नों में फैले हुए हैं।

कोर्ट ने गौर किया कि अभी तक आरोप तय (charges framed) नहीं हुए हैं और मुकदमा शुरू भी नहीं हुआ है। सबूतों की भारी मात्रा को देखते हुए, कोर्ट ने कहा कि कानूनी कार्यवाही में काफी समय लग सकता है।

इसके अलावा, बेंच ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि कई अन्य सह-आरोपियों को जमानत या अंतरिम सुरक्षा मिल चुकी है। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए, कोर्ट ने माना कि अपीलकर्ताओं को और अधिक समय तक जेल में रखना न तो उचित है और न ही जरूरी।

लिहाजा, कोर्ट ने जोशी और पाठक के मामले में हाई कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और उन्हें जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

जोशी की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ अग्रवाल पेश हुए। पाठक का पक्ष एडवोकेट कौशल शर्मा ने रखा।

राज्य की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और एडिशनल एडवोकेट जनरल पद्मेश मिश्रा पेश हुए।

[आदेश पढ़ें]

Mahesh_Chandra_Joshi_v__State_of_Rajasthan_.pdf
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Pre-trial detention cannot become punishment without trial: Supreme Court