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वादकरण

राजस्थान HC ने केवल 'अभद्र व्यवहार' के आरोप में IRS अधिकारी को गलत तरीके से निलंबित करने पर केंद्र पर 5 लाख का जुर्माना लगाया

अदालत ने पाया कि कुछ उच्च-पदस्थ अधिकारियों की ओर से याचिकाकर्ता के खिलाफ व्यक्तिगत रंजिश थी।

Bar & Bench

हाल ही में जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ इनडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स को आदेश दिया कि वे इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) के एक अधिकारी को ₹5,00,000 का हर्जाना (exemplary costs) दें, जिन्हें मनमाने ढंग से नौकरी से सस्पेंड कर दिया गया था। [मनमीत सिंह अहलूवालिया बनाम भारत संघ]

जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण और जस्टिस अनूप सिंघी की बेंच ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के उस फ़ैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कस्टम्स और GST के डिप्टी कमिश्नर मनमीत सिंह अहलूवालिया के सस्पेंशन ऑर्डर को सही ठहराया गया था।

कोर्ट ने कहा कि अधिकारी पर लगे आरोप - जो उनके परिवार के सदस्यों से जुड़े एक घरेलू विवाद और कोविड के समय छुट्टी से जुड़ी कुछ कमियों से संबंधित थे - "छोटी-मोटी गलतियों को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने" जैसा था। इसके आधार पर लंबे समय तक सस्पेंशन जैसा कड़ा कदम उठाना किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने कहा,

"सस्पेंशन को बार-बार बढ़ाने से उन्हें बहुत मानसिक परेशानी हुई और उनका शानदार करियर बर्बाद हो गया। याचिकाकर्ता को प्रमोशन के मौकों से वंचित होना पड़ा। परिवारों के बीच हुई एक घटना ने एक बड़े अधिकारी का करियर खत्म कर दिया। यह ऊंचे ओहदे वाले अधिकारियों की बदले की भावना का स्पष्ट मामला है।"

यह विवाद 2019 में दिल्ली में अधिकारी के सरकारी आवास पर उनकी मां और विधवा बहन के बीच हुई बहस से शुरू हुआ था। इसके बाद शिकायतें हुईं, घर खाली करने का नोटिस मिला और उनका तबादला जोधपुर कर दिया गया।

उसी रिहायशी कॉलोनी में रहने वाले अधिकारियों की ओर से और भी शिकायतें आईं, साथ ही महामारी के दौरान बिना इजाज़त गैर-हाजिर रहने के आरोप भी लगे।

अधिकारी को मई 2021 में सस्पेंड किया गया था और सस्पेंशन को दो बार बढ़ाया गया। बाद में इसे खत्म होने दिया गया और अगस्त 2022 में औपचारिक रूप से रद्द कर दिया गया, जिसके बाद उनके खिलाफ चार्जशीट जारी की गई। अधिकारी ने सस्पेंशन बढ़ाने के आदेशों को चुनौती देते हुए CAT का दरवाजा खटखटाया था और प्रमोशन व उससे जुड़े लाभों की मांग की थी, लेकिन ट्रिब्यूनल ने उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की।

कोर्ट ने पाया कि मुख्य आरोप या तो अधिकारी के आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े नहीं थे या फिर वे खुद अधिकारी के बजाय परिवार के सदस्यों से संबंधित थे। कोर्ट ने कहा कि इनमें से कोई भी आरोप, अगर साबित भी हो जाए, तो भी नौकरी से बर्खास्तगी या हटाने का आधार नहीं बन सकता।

कोर्ट ने कहा कि सस्पेंशन एक बहुत कड़ा कदम है जो केवल गंभीर कदाचार के लिए उठाया जाता है। अनुशासनात्मक प्राधिकरण के पास शुरुआती सस्पेंशन के समय ही सभी जरूरी जानकारी मौजूद थी, इसलिए सस्पेंशन को बढ़ाना गैर-जरूरी था। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिस तरह से आरोप सामने आए, उससे पहली नज़र में ही कुछ बड़े अधिकारियों की अधिकारी के प्रति व्यक्तिगत बदले की भावना साफ झलकती है।

बेंच ने निर्देश दिया कि अधिकारी को उनके मूल 90 दिनों के सस्पेंशन की अवधि खत्म होने के समय से ही बहाल माना जाए और बढ़ी हुई अवधि के लिए पूरी सैलरी दी जाए।

याचिकाकर्ता खुद कोर्ट में पेश हुए। प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता राजवेंद्र सारस्वत, अधिवक्ता जितेश कुमार सुथार और ऋषभ दाधीच उपस्थित हुए।

[निर्णय पढ़ें]

Manmeet_Singh_Ahluwalia_v__Union_of_India.pdf
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Rajasthan High Court imposes ₹5 lakh costs on Centre for wrongly suspending IRS officer over 'rude behaviour'