ज़ी ग्रुप के फाउंडर सुभाष चंद्रा ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की पांच सदस्यों वाली स्पेशल बेंच के 1 सितंबर के उस आदेश के खिलाफ नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में अपील की है, जिसमें उन्हें अपनी संपत्ति बेचने या ट्रांसफर करने से रोका गया था।
कार्यवाहक चेयरपर्सन जस्टिस (रिटायर्ड) योगेश खन्ना और टेक्निकल मेंबर बरुन मित्रा और अजय दास मेहरोत्रा की बेंच ने अपील पर सुनवाई की और चंद्रा को निर्देश दिया कि वे क्रेडिटर्स को याचिका की कॉपी दें।
इसके बाद बेंच ने मामले की सुनवाई के लिए 29 सितंबर की तारीख तय की।
चंद्रा की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने NCLAT को बताया कि यह अपील NCLT की स्पेशल बेंच द्वारा 1 सितंबर को दिए गए आदेश को चुनौती देती है।
हालांकि, कई क्रेडिटर्स ने NCLAT को बताया कि उन्हें अपील की कॉपी नहीं दी गई है या NCLT के सामने कार्यवाही में शामिल होने के बावजूद उन्हें पार्टी नहीं बनाया गया है।
इसके बाद NCLAT ने चंद्रा से कहा कि वे उसी दिन मौजूद पार्टियों को अपील की कॉपी दें और ज़रूरी पार्टियों को शामिल करने के लिए कदम उठाएं।
यह विवाद चंद्रा द्वारा प्रस्तावित रीपेमेंट प्लान (कर्ज चुकाने की योजना) से जुड़ा है। यह प्लान 'इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड' (IBC) की धारा 95 के तहत 'इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड' द्वारा शुरू की गई पर्सनल इंसॉल्वेंसी कार्यवाही के दौरान पेश किया गया था।
इस प्लान के तहत, चंद्रा ने ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के बदले लेनदारों को ₹6.25 करोड़ चुकाने का प्रस्ताव दिया था। इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया की लागत के लिए ₹25 लाख अलग रखे गए थे।
शुरुआत में NCLT की एक बेंच ने इस प्लान पर विचार किया, जिसमें ज्यूडिशियल मेंबर अशोक कुमार भारद्वाज और टेक्निकल मेंबर रीना सिन्हा पुरी शामिल थे। दोनों सदस्यों की राय अलग-अलग थी।
भारद्वाज ने केवल उन लेनदारों के संबंध में प्लान को मंज़ूरी देने का समर्थन किया जिन्होंने इसका समर्थन किया था। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि असहमति रखने वाले लेनदारों (जिनमें बैंक और वित्तीय संस्थान शामिल हैं) को अपना कर्ज वसूलने के लिए स्वतंत्र उपाय करने की अनुमति दी जाए।
पुरी ने रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में गंभीर कमियां पाए जाने के बाद प्लान को खारिज कर दिया।
इसके बाद मामले को 'कंपनीज़ एक्ट, 2013' की धारा 419(5) के तहत तीसरे सदस्य, ज्यूडिशियल मेंबर नीलेश शर्मा के पास भेजा गया।
25 अगस्त को शर्मा ने कहा कि प्लान को मंज़ूरी दी जानी चाहिए। हालांकि, उन्होंने अनिल कुमार के ज़रिए 960 व्यक्तियों और सुनील जैन के ज़रिए 300 व्यक्तियों की ओर से जमा किए गए दावों को बाहर रखने का निर्देश दिया। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि इन दावों के लिए आवंटित राशि को बाकी योग्य लेनदारों के बीच फिर से बांटा जाए।
शर्मा ने आगे कहा कि मंज़ूर किया गया प्लान IBC की धारा 115 के तहत सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगा, जिसमें वे लेनदार भी शामिल हैं जिन्होंने इसका विरोध किया था।
जब मामला मूल दो-सदस्यीय बेंच के पास वापस आया, तो उसने 31 अगस्त को कहा कि तीसरे सदस्य की ओर से कोई बहुमत वाली राय सामने नहीं आई है। बेंच ने गौर किया कि टेक्निकल मेंबर ने प्लान को खारिज कर दिया था, ज्यूडिशियल मेंबर ने इसे केवल समर्थन करने वाले लेनदारों तक सीमित रखने की कोशिश की थी और तीसरे सदस्य ने इसे मंज़ूरी देते हुए सभी लेनदारों पर बाध्यकारी बना दिया था।
चूंकि तीनों फैसले अलग-अलग थे, इसलिए मामले को नए सिरे से NCLT प्रेसिडेंट के पास भेजा गया, जिन्होंने मामले की सुनवाई के लिए पांच-सदस्यीय बेंच का गठन किया।
बड़ी बेंच ने चंद्रा को किसी भी संपत्ति को बेचने या हस्तांतरित करने से रोक दिया और साथ ही उस आदेश पर भी रोक लगा दी जिसमें ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकार किए गए दावों के बदले लेनदारों को ₹6.25 करोड़ चुकाने के उनके प्रस्ताव को सही ठहराया गया था।
इसके बाद चंद्रा ने NCLAT का रुख किया। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पब्लिक सेक्टर की संस्थाओं की ओर से पक्ष रखा।
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