नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की चेन्नई बेंच ने गुरुवार को वरिष्ठ वकीलों, खासकर दिल्ली से आए वकीलों की कड़ी आलोचना की। बेंच ने कहा कि ये वकील लंबी बहस करके अदालती समय पर अपना कब्जा जमा लेते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि उनकी भारी-भरकम फीस और उनका ओहदा इस बात को सही नहीं ठहराता कि उनके कारण दूसरे पक्षकारों को इंतजार करना पड़े या जजों को शनिवार के दिन भी काम करना पड़े।
न्यायमूर्ति एन. शेषशायी (न्यायिक सदस्य) और जतिंद्रनाथ स्वैन (तकनीकी सदस्य) की पीठ ने वरिष्ठ वकीलों द्वारा लंबी बहस किए जाने पर नाराजगी जताई और चेतावनी दी कि अगर ऐसा ही चलता रहा, तो वे समय की सख्त सीमा तय कर देंगे।
अदालत ने कहा कि "सुपरस्टार" वकीलों द्वारा ली जाने वाली भारी-भरकम फीस या उनकी पेशेवर हैसियत, अन्य पक्षकारों को इंतजार कराने का कोई उचित कारण नहीं हो सकती।
पीठ ने टिप्पणी की, "सिर्फ इसलिए कि आप बार के 'सुपरस्टार' हैं और आपको मोटी फीस मिली है, इसका मतलब यह नहीं है कि आप स्क्रीन पर ज्यादा समय ले सकते हैं। यह आपकी और आपके मुवक्किल की समस्या है कि वह कितना खर्च कर सकता है। इससे हमारा कोई लेना-देना नहीं है।"
ट्रिब्यूनल ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि वकीलों की लंबी बहस के कारण जजों को शनिवार के दिन भी काम करना पड़ रहा है।
पीठ ने सवाल किया, "जैसे इस शनिवार को, हमें काम करना पड़ रहा है। हमें इसके लिए कौन पैसे देता है? कोई नहीं। तो फिर हम काम क्यों करें?"
ट्रिब्यूनल ने विशेष रूप से दिल्ली से आए वकीलों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें बहस के लिए उपलब्ध समय का ध्यान रखना चाहिए।
ट्रिब्यूनल ने चेतावनी दी कि अगर वकील संयम नहीं बरतते हैं, तो बेंच दलीलों के लिए एक समय सीमा तय कर देगी, चाहे वकील कितना भी बड़ा या प्रतिष्ठित क्यों न हो।
बेंच ने कहा, "खास तौर पर दिल्ली से आने वाले वकील - जो भी दिल्ली के वकीलों को काम पर रखते हैं - आपको आगे बढ़ना होगा। वरना, मैं एक समय सीमा तय कर दूंगा। फिर चाहे किसी भी पक्ष की ओर से बहस करने के लिए खुद भगवान ही क्यों न आ जाएं, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता।"
सिर्फ इसलिए कि आप बार (वकालत) के सुपरस्टार हैं और आपको भारी फीस मिली है, इसका मतलब यह नहीं है कि आप स्क्रीन पर ज्यादा समय ले सकते हैं।NCLAT
ये टिप्पणियां ऐसे समय में आई हैं जब NCLAT पर उन मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुनने का दबाव बढ़ रहा है, जिनमें तत्काल सुनवाई की जरूरत है।
27 अक्टूबर को, सुप्रीम कोर्ट ने नई दिल्ली स्थित NCLAT की प्रधान पीठ (Principal Bench) की आलोचना की थी, क्योंकि उसने जल्द सुनवाई के अनुरोध के बावजूद एक अपील पर सुनवाई नहीं की।
'सोना बंसल बनाम वशिष्ठ कुमार गोयल' मामले में, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अदालतों और न्यायाधिकरणों (tribunals) से किए गए अनुरोधों को अनिवार्य निर्देशों के रूप में माना जाना चाहिए। कोर्ट ने चेतावनी दी कि इन निर्देशों का पालन न करने को बहुत गंभीरता से लिया जाएगा।
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें
Superstar lawyers who charge hefty fees can't monopolise court time: NCLAT