सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक वकील की याचिका खारिज कर दी। वकील ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उनके क्लाइंट्स की ओर से दायर 21 लंबित मामलों को लिस्ट करने की उनकी याचिका को खारिज कर दिया गया था [LK Charles Alexander v. Registrar General, Madras High Court]।
जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और अपारेश कुमार सिंह की बेंच ने हाई कोर्ट के फ़ैसले में दखल देने से इनकार कर दिया।
जस्टिस नाथ ने कहा, "रजिस्ट्री किसके आदेश पर काम करती है? हमें बताइए। क्या आपने कभी देखा है कि कॉज़ लिस्ट के आखिर में क्या लिखा होता है? 'चीफ़ जस्टिस के आदेश से प्रकाशित'। आप चीफ़ जस्टिस को निर्देश देने की मांग कर रहे हैं। याचिका खारिज की जाती है।"
वकील एलके चार्ल्स अलेक्जेंडर ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसमें वहां लंबित मामलों को लिस्ट करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई थी।
जस्टिस नाथ ने पूछा, "क्या आपने दूसरे कोर्ट्स को आपके मामलों पर सुनवाई करने का निर्देश देने के लिए हाई कोर्ट में 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (mandamus) दायर की थी?"
अलेक्जेंडर ने साफ़ किया, "माई लॉर्ड्स, रजिस्ट्री को निर्देश देने के लिए।"
इसके बाद जस्टिस नाथ ने पूछा कि क्या अलेक्जेंडर वकील हैं। उनके 'हां' में जवाब देने के बाद, कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
अलेक्जेंडर ने मद्रास हाई कोर्ट में यह आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी कि उनके क्लाइंट्स की ओर से दायर 21 मामलों को रजिस्ट्री से बार-बार अनुरोध करने के बावजूद लिस्ट नहीं किया गया था।
3 जुलाई को, चीफ जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी अरुल मुरुगन की डिवीजन बेंच ने उनकी याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि लिस्टिंग की तय प्रक्रियाओं को दरकिनार करने के लिए रिट याचिकाओं का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने कहा कि वकीलों और मुकदमों से जुड़े लोगों के पास पहले से दायर मामलों से पहले अपने मामलों को लिस्ट करवाने का कोई निहित या मौलिक अधिकार नहीं है, सिवाय इसके कि वे अर्जेंट लिस्टिंग के लिए तय प्रक्रिया का पालन करें।
कोर्ट ने बताया कि अलेक्जेंडर संबंधित रोस्टर देखने वाली बेंच के सामने 'मेंशन मेमो' पेश कर सकते हैं या लिस्टिंग में किसी भी गड़बड़ी के बारे में रजिस्ट्रार (जुडिशियल) को अपनी बात रख सकते हैं।
इसके बाद अलेक्जेंडर ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
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Supreme Court dismisses lawyer’s plea seeking listing of 21 cases before Madras High Court