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वादकरण

सुप्रीम कोर्ट ने 2,000 से ज़्यादा के मर्चेंट UPI ट्रांज़ैक्शन पर MDR लगाने के केंद्र के फ़ैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया

कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि भले ही अधिकारियों का कहना है कि व्यापारी ये लागत ग्राहकों पर नहीं डाल सकते, लेकिन इस फीस की वजह से UPI पेमेंट लेने से इनकार किया जा सकता है।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ₹2,000 से ज़्यादा के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) ट्रांज़ैक्शन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाने के केंद्र सरकार के हालिया फ़ैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया [अंजन दत्ता बनाम भारत संघ]।

हालांकि, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने सरकार से नए फ्रेमवर्क का आधार बताते हुए एक हलफनामा दाखिल करने को कहा।

कोर्ट ने इस फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर यह आदेश दिया।

CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने कोर्ट को बताया कि व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) UPI ट्रांसफर पूरी तरह से मुफ़्त रहेंगे और लगभग 96 प्रतिशत मर्चेंट ट्रांज़ैक्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

घोषित फ्रेमवर्क के तहत, ₹2,000 तक के व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) ट्रांसफर और व्यक्ति-से-मर्चेंट (P2M) पेमेंट मुफ़्त रहेंगे।

हालांकि, ₹2,000 से ज़्यादा के P2M पेमेंट पर 0.4% MDR लागू होगा, जिसमें ₹75,000 और उससे ज़्यादा के ट्रांज़ैक्शन के लिए अधिकतम शुल्क ₹300 तय किया गया है। कुछ खास ज़रूरी सेक्टर के लिए ₹5 का फ्लैट चार्ज लगेगा, कैपिटल-मार्केट पेमेंट पर 0.02% लेवी लगेगी और हर महीने ₹1 लाख तक की कमाई करने वाले मर्चेंट को छूट मिलेगी।

कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि भले ही आधिकारिक तौर पर यह कहा गया है कि मर्चेंट इन लागतों का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाल सकते, लेकिन तय सीमा से ज़्यादा की प्राप्तियों पर लगने वाला शुल्क आखिरकार कीमतों में शामिल हो जाएगा, वर्किंग कैपिटल कम कर देगा, और कम मार्जिन वाले व्यापारियों के बीच UPI पेमेंट लेने से इनकार करने या ट्रांज़ैक्शन को कई हिस्सों में बांटने जैसी स्थिति पैदा करेगा।

याचिका में 15 अक्टूबर से लागू होने वाले प्रस्तावित MDR फ्रेमवर्क पर सवाल उठाए गए। इसमें बताया गया कि जहां ₹2,000 से ज़्यादा के UPI पेमेंट पर लेवी लगाई गई है, वहीं RuPay-पावर्ड डेबिट कार्ड को बिना किसी मौद्रिक सीमा के "बिना शुल्क" वाली सुरक्षा दी जा रही है।

याचिका में बिना किसी लागत अध्ययन, कार्यप्रणाली या लागू करने योग्य सुरक्षा उपायों (जो लागत को आगे बढ़ाने से रोकें) का खुलासा किए बिना देशव्यापी अनिवार्य पेमेंट का बोझ डालने पर सवाल उठाए गए।

वकील अंजन दत्ता द्वारा दायर PIL में यह भी तर्क दिया गया कि ₹2,000 के ट्रांज़ैक्शन मार्क और ₹1 लाख की मासिक प्राप्ति सीमा जैसे आंकड़े किसी भी सार्वजनिक डेटा से समर्थित नहीं हैं।

अदालत में यह बात रखी गई कि ₹2,001 के ट्रांज़ैक्शन पर प्रतिशत के हिसाब से शुल्क लगता है जबकि ₹2,000 पर नहीं, जिससे वित्तीय "क्लिफ" (अचानक बदलाव की स्थिति) बनती है जो बाज़ार के व्यवहार को बिगाड़ती है और एक जैसी स्थिति वाले मर्चेंट के बीच भेदभाव करती है, साथ ही कैप (अधिकतम सीमा) के ज़रिए बहुत ज़्यादा मूल्य वाले ट्रांज़ैक्शन को फ़ायदा पहुंचाती है।

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Supreme Court refuses to stay Centre's decision to levy MDR on merchant UPI transactions over ₹2,000