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वादकरण

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता की भाजपा सांसद कृपानाथ मल्लाह की 2024 की चुनावी जीत को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका बहाल की

यह चुनावी याचिका कांग्रेस उम्मीदवार और सीनियर एडवोकेट हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी ने दायर की थी, जो मल्लाह से 18,360 वोटों से हार गए थे।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुवाहाटी हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को रद्द कर दिया, जिसमें 2024 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद कृपानथ मल्लाह की जीत को चुनौती देने वाली चुनावी याचिका को खारिज कर दिया गया था। [हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी बनाम कृपानथ मल्लाह और अन्य]

कांग्रेस उम्मीदवार और सीनियर वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी ने मल्लाह के चुनाव को इस आधार पर चुनौती दी थी कि बीजेपी नेता ने असम के करीमगंज संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था।

हालांकि, अप्रैल 2025 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने चौधरी की याचिका में कुछ कमियां पाते हुए उसे खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं किया था।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और के विनोद चंद्रन की बेंच ने आज इस फैसले के खिलाफ चौधरी की अपील को मंज़ूरी दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने चौधरी की याचिका को शुरुआती स्तर पर ही खारिज करने के लिए जिन कमियों का हवाला दिया था, वे याचिका को खारिज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं थीं।

Justice JB Pardiwala and Justice Vinod Chandran

हाईकोर्ट ने जिस कमी की ओर इशारा किया था, वह चौधरी द्वारा दायर 'फॉर्म 25' के हलफनामे से जुड़ी थी। चौधरी ने यह हलफनामा मल्लाह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के समर्थन में दायर किया था।

हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में मौजूद असली हलफनामे को देखकर ऐसा लग रहा था कि इसे हलफनामा कमिश्नर के सामने प्रमाणित (affirmed) किया गया था। लेकिन, मल्लाह को दी गई कॉपी पर ऐसी पुष्टि या प्रमाणन का कोई निशान नहीं था।

सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि इस कमी के आधार पर पूरी चुनाव याचिका को खारिज करना सही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "साफ है कि धारा 83 के तहत आई कमी का मतलब यह नहीं है कि RoP एक्ट की धारा 86 के तहत याचिका को तुरंत खारिज कर दिया जाए।"

इसलिए, कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह जांच करे कि क्या असली हलफनामे में ज़रूरी प्रमाणन मौजूद था। अगर ऐसा था, तो हाईकोर्ट को याचिका पर मेरिट के आधार पर विचार करना चाहिए, जिसमें भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच भी शामिल है।

अगर ज़रूरी प्रमाणन नहीं था, तो कोर्ट ने कहा कि चौधरी को भ्रष्टाचार के आरोपों को आगे बढ़ाने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाई कोर्ट को याचिका में उठाए गए अन्य स्वतंत्र आधारों (अगर कोई हों) की जांच ज़रूर करनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा, "हाईकोर्ट से बस इतना ही कहना काफी है कि वह जांच करे; अगर शपथ पर पुष्टि का उचित प्रमाणन मौजूद है, तो मामले पर मेरिट के आधार पर आगे बढ़े; और अगर प्रमाणन नहीं है, तो भ्रष्टाचार के आरोपों पर विचार करने की इजाज़त न दे, लेकिन अन्य आधारों (अगर कोई बताए गए हों) पर मेरिट के आधार पर विचार करना जारी रखे।"

मल्लाह ने चौधरी को 18,360 वोटों से हराया था, जो कुल वोटों का लगभग 1.6 प्रतिशत था।

इसके बाद चौधरी ने चुनाव याचिका दायर की और आरोप लगाया कि मल्लाह ने चुनाव प्रचार और वोटिंग के दिन कई "भ्रष्ट तरीके" अपनाए थे, जिनमें बड़े पैमाने पर धांधली, बूथ कैप्चरिंग, वोटरों को डराना-धमकाना और रिश्वतखोरी शामिल थी।

उन्होंने यह भी दावा किया कि इन कथित अनियमितताओं के बारे में चुनाव अधिकारियों और भारत के चुनाव आयोग (ECI) से कई शिकायतें की गई थीं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

चौधरी ने वोटों की गिनती की प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, ECI के वोटर-टर्नआउट डेटा से पता चला कि 11,36,538 वोट डाले गए थे। पोस्टल बैलेट को शामिल करने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 11,43,796 हो गया। हालांकि, उन्होंने दावा किया कि आखिर में 11,47,607 वोटों की गिनती हुई, जिससे 3,811 वोटों का ऐसा अंतर सामने आया जिसका कोई स्पष्ट कारण नहीं था।

अप्रैल 2025 में, गुवाहाटी हाई कोर्ट ने मल्लाह को दी गई कॉपी में कुछ कमियां पाए जाने के कारण चौधरी की याचिका को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया। कोर्ट ने बीजेपी नेता के खिलाफ आरोपों के गुण-दोष पर विचार नहीं किया।

चौधरी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट के सामने विवाद मल्लाह को दी गई चुनाव याचिका की कॉपी में बताई गई तीन कमियों पर केंद्रित था।

पहली कमी पेजों को प्रमाणित करने के तरीके से जुड़ी थी। पेज 1 से 84 पर "असली कॉपी के रूप में प्रमाणित" (attested to be true copy) लिखा था, जबकि पेज 85 से 185 पर "असली कॉपी के रूप में सत्यापित" (certified to be true copy) लिखा था।

हाईकोर्ट ने माना था कि बाद वाले पेज 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' की धारा 81(3) के तहत जरूरी शर्तों को पूरा नहीं करते थे।

सुप्रीम कोर्ट इससे सहमत नहीं था। उसने कहा कि यह प्रावधान प्रमाणन का कोई खास तरीका तय नहीं करता है और दोनों तरह के प्रमाणन का मतलब एक ही है।

कोर्ट ने कहा, "अलग-अलग रबर स्टैम्प का इस्तेमाल एक ही बात बताता है।"

कोर्ट ने मल्लाह के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि उन्हें दी गई कॉपी में चार पेज गायब थे। कोर्ट हाई कोर्ट की इस बात से सहमत था कि यह आपत्ति बाद में सोची-समझी गई थी, क्योंकि मल्लाह ने मामले में अपनी पिछली पेशियों के दौरान यह बात नहीं उठाई थी।

कोर्ट ने इस मामले में चौधरी की अपील स्वीकार कर ली और हाई कोर्ट को मामले पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया।

चौधरी की ओर से सीनियर एडवोकेट हरिन प्रवीणकांत रावल पेश हुए।

मल्लाह की ओर से एडवोकेट वजीह शफीक पेश हुए।

[फैसला पढ़ें]

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Supreme Court restores Congress leader’s election petition challenging BJP MP Kripanath Mallah’s 2024 poll win