Gyanesh Kumar  
वादकरण

सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई और वोटर डिलीशन की SIT जांच की मांग पर केंद्र से जवाब मांगा

याचिकाकर्ता ने CEC ज्ञानेश कुमार, सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और ECI की डायरेक्टर जनरल (इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) सीमा खन्ना के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया। यह याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञान कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग करती है। यह याचिका 'इंडियन एक्सप्रेस' की हालिया रिपोर्ट के आधार पर दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) पर कई फैसले लिए, जबकि तीन में से दो चुनाव आयुक्तों ने इन फैसलों पर आपत्ति जताई थी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने इस मामले को कुमार के खिलाफ एक और याचिका के साथ जोड़ दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुईं सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि नागरिकों के वोटिंग अधिकार खतरे में हैं और CEC पक्षपाती है।

गुरुस्वामी ने कहा, "दिल्ली में, यह वोटर्स का 30 प्रतिशत है। बंगाल में, यह वोटर्स का 25 प्रतिशत था। अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास 16 लाख अपीलें पेंडिंग हैं। उन लोगों को पहले ही एक चुनाव चक्र से बाहर रखा जा चुका है। अब एक और चुनाव चक्र आ गया है।"

बेंच ने गुरुस्वामी से याचिका में की गई मांगों के बारे में पूछा, लेकिन गुरुस्वामी ने कहा कि वह अपनी मांगों पर कायम हैं।

CJI कांत ने पूछा, "क्या आपने अपनी मांगें देखी हैं?"

उन्होंने जवाब दिया, "हां, और मैं उन मांगों पर कायम हूं। मैं उन मांगों पर कायम हूं। उन मांगों में क्या कमी है? जब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के वोटिंग अधिकार खतरे में हों और SIR लागू किया जा रहा हो, और मुख्य चुनाव आयुक्त का कामकाज पक्षपाती हो - कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है।"

CJI कांत ने जवाब दिया, "हम भी अपना होमवर्क करते हैं। हम भी मामले को जानते हैं।"

गुरुस्वामी ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे किसी खास राज्य से जुड़े नहीं हैं, बल्कि पूरे देश पर असर डालते हैं।

उन्होंने तर्क दिया, "यह किसी खास राज्य तक सीमित नहीं है। राज्य का इस्तेमाल सिर्फ़ एक उदाहरण के तौर पर किया जा रहा है। हम हाल के चुनावों पर ध्यान दिला रहे हैं। यह CEC और चुनाव आयुक्तों के राष्ट्रीय कामकाज और चुनाव आयोग संस्था से जुड़ा मामला है। उस गैर-कानूनी काम को एक असंवैधानिक कानून के ज़रिए बचाया जा रहा है। इस तरह के पक्षपाती व्यवहार के लिए क्या सज़ा है? क्या यह सरकारी ड्यूटी का पालन है? मैं खुद से यह सवाल पूछती हूं। हम इस देश में आज़ाद और निष्पक्ष चुनावों के माहौल में बड़े हुए हैं। आज वे नहीं रहे। मैं इन मांगों पर कायम हूं, हर एक मांग पर। यह एक राष्ट्रीय समस्या है।"

CJI Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi, Justice V Mohana

यह याचिका वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी। इसमें मांग की गई थी कि ECI द्वारा चुनाव आयुक्तों के बहुमत की सहमति के बिना लिए गए सभी फैसलों को गैर-कानूनी और अमान्य घोषित करने का निर्देश दिया जाए।

याचिका में मांग की गई है, "प्रतिवादी नंबर 3 (CEC ज्ञानेश कुमार) के तहत पूरे आयोग की सहमति के बिना या चुनाव आयुक्तों की बहुमत राय के खिलाफ (CEC और अन्य EC अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत) शुरू किए गए, मंजूर किए गए या लागू किए गए सभी फैसलों, दिशानिर्देशों, आदेशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को असंवैधानिक, अधिकार क्षेत्र से बाहर और शुरू से ही अमान्य घोषित किया जाए।"

याचिकाकर्ता ने CEC ज्ञानेश कुमार, सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और ECI की डायरेक्टर जनरल (IT) सीमा खन्ना के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग की है।

याचिका में कहा गया है, "सक्षम कानूनी अथॉरिटी को उचित निर्देश जारी किए जाएं कि वे प्रतिवादी नंबर 3, 5, 6 और आधिकारिक ड्यूटी का जानबूझकर उल्लंघन करने के दोषी पाए गए अन्य सभी अधिकारियों के खिलाफ 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950' की धारा 32 के तहत शिकायतें दर्ज करें और मुकदमा शुरू करें।"

याचिका के अनुसार, आधिकारिक फाइलों से पता चला है कि 10 महीने की अवधि (नवंबर 2025 – अगस्त 2026) के दौरान, दो चुनाव आयुक्तों—डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी—ने आयोग के नाम पर लिए गए और लागू किए गए एकतरफा, बिना अधिकार के और गैर-कानूनी फैसलों के खिलाफ कम से कम 14 अलग-अलग मौकों पर (जिसमें एक ही दिन में चार बार शामिल है) औपचारिक रूप से लिखित असहमति और आपत्तियां दर्ज कराईं।

याचिकाकर्ता ने कहा कि SIR के दौरान वोटर लिस्ट से 13 करोड़ वोटरों के नाम हटाने की जांच किसी न्यायिक जांच आयोग या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से कराई जानी चाहिए।

खास बात यह है कि याचिका में 'वोटर रजिस्ट्रेशन नियम, 1960' के तहत बताए गए कानूनी 'फॉर्म 6' को फिर से लागू करने और सभी योग्य वयस्कों को मूल कानूनी शर्तों के आधार पर वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन करने की अनुमति देने की भी मांग की गई है।

Menaka Guruswamy

याचिका में CEC द्वारा अधिकारियों के साथ मिलकर किए गए कई कामों को "गैर-कानूनी" बताया गया है।

याचिका के अनुसार, CEC ने कानूनी रूप से तय फॉर्म 6 (जिसका इस्तेमाल वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए नए वोटर या दूसरी सीट पर जाने वाले लोग करते हैं) में एकतरफा बदलाव करते हुए पहली बार वोट देने वाले युवाओं के लिए पैतृक जानकारी ("पिछला SIR लिंक") देना ज़रूरी कर दिया।

यह काम बिना किसी कानूनी अधिकार या 'रजिस्ट्रेशन ऑफ़ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' में संशोधन किए बिना किया गया। ज़्यादातर चुनाव आयुक्तों ने इस कदम को साफ़ तौर पर "बिना अधिकार वाला और गैर-कानूनी" बताया।

इसके अलावा, 'रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द पीपल एक्ट, 1950' की धारा 13B, 22 और 23 के तहत इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) के कानूनी अधिकारों को छीन लिया गया और वोटर लिस्ट के मैनेजमेंट को IT के डायरेक्टर जनरल (DG-IT) के अधीन सेंट्रलाइज़ कर दिया गया।

याचिका में यह भी कहा गया कि सॉफ्टवेयर में जानबूझकर "रोलबैक" सुविधा नहीं दी गई, जिससे EROs अदालती निर्देशों के बावजूद गोवा में 97 योग्य वोटरों के नाम वापस लिस्ट में नहीं जोड़ पाए।

गोवा के मुख्य चुनाव अधिकारी ने सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश भारती और DG-IT सीमा खन्ना को लगातार आठ बार पत्र लिखकर ECINet में "रोलबैक/रिवर्सल" फीचर चालू करने का अनुरोध किया, क्योंकि EROs ने 97 वोटरों को पूरी तरह योग्य पाया था। आरोप है कि ECI-IT डिवीज़न ने इन अनुरोधों को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिससे सभी 97 नागरिक वोट देने के अधिकार से वंचित रह गए।

पश्चिम बंगाल के विवादित SIR के मामले में, याचिका में कहा गया है कि ECI ने पश्चिम बंगाल अपीलेट ट्रिब्यूनल में नागरिकों के खिलाफ 16.10 लाख से ज़्यादा अपीलें दायर कीं।

ये अपीलें उन वोटरों के नाम शामिल करने के खिलाफ दायर की गई थीं, जिन्हें SIR के दौरान शुरू में लिस्ट से हटा दिया गया था, लेकिन बाद में न्यायिक अधिकारियों ने उन्हें वापस लिस्ट में शामिल कर दिया था।

याचिका के अनुसार, ये अपीलें अन्य दो चुनाव आयुक्तों या पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) की जानकारी, मंज़ूरी या अनुमति के बिना दायर की गई थीं। याचिका के अनुसार,

"अगस्त 2026 में, चुनाव आयुक्त संधू ने लिखित रूप में पूछा: 'ECI की ओर से ये अपीलें दायर करने के लिए किसे अधिकृत किया गया था, और किसके द्वारा?' और 'ECI की ओर से असल में ये अपीलें किसने दायर कीं?' आयुक्त संधू, आयुक्त जोशी या पश्चिम बंगाल के CEO में से किसी को भी इन 16.10 लाख अपीलों के बारे में कोई जानकारी या अधिकार नहीं था। यह न्यायिक लाभार्थियों को उनके अधिकारों से वंचित करने के लिए किया गया एक मनगढ़ंत और अनधिकृत कानूनी दांव-पेच है।"

सीनियर डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग के बारे में याचिकाकर्ता ने कहा कि गर्ग ने एकतरफा आदेश जारी करके IT निगरानी ढांचे में बदलाव किया और DEC संजय कुमार को IT मामलों से हटा दिया।

इस वजह से दो चुनाव आयुक्तों, संधू और जोशी को सीधे कैबिनेट सचिव के पास याचिका दायर करनी पड़ी।

यह याचिका वकील चांद कुरैशी के माध्यम से दायर की गई थी।

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Supreme Court seeks Centre's response on plea for action against CEC Gyanesh Kumar, SIT probe into voter deletions