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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने गणेश विसर्जन जुलूस में हुई हिंसा पर रिपोर्ट लिखने वाले पत्रकार के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया

अदालत ने कहा कि हिंसा से जुड़ी किसी घटना की केवल रिपोर्टिंग करना, अलग-अलग समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का अपराध नहीं माना जाएगा।

Bar & Bench

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक पत्रकार के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया है। उस पत्रकार पर 2025 में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान हुई हिंसा की घटना पर एक समाचार रिपोर्ट के जरिए दुश्मनी को बढ़ावा देने का आरोप था [उवेश खान उर्फ ​​उवेश रिपोर्टर बनाम मध्य प्रदेश राज्य]।

न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी ने कहा कि हिंसा से जुड़ी किसी घटना की केवल रिपोर्टिंग करना, भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196(1) के तहत विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी या वैमनस्य को बढ़ावा देने का अपराध नहीं माना जाएगा।

अदालत ने कहा, "प्रकाशन की प्रकृति और सामग्री, वह संदर्भ जिसमें इसे प्रकाशित किया गया, और समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने या ऐसा करने के प्रयास के साथ उसका सीधा संबंध होना - ये सभी महत्वपूर्ण बातें हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए।"

अदालत ने आगे कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मिली अभिव्यक्ति की आज़ादी को केवल इसलिए सीमित नहीं किया जा सकता क्योंकि कोई रिपोर्ट किसी संवेदनशील सार्वजनिक घटना से जुड़ी है।

पीठ ने कहा कि इस तरह की अभिव्यक्ति पर लगाई जाने वाली कोई भी पाबंदी कानून की नज़र में उचित होनी चाहिए।

Justice Himanshu Joshi

अदालत उवेश खान नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसने बताया कि वह एक पत्रकार है और एक यूट्यूब न्यूज़ चैनल चलाता है। खान ने सितंबर 2025 में सिलवानी में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान हुई हिंसा की एक घटना पर रिपोर्ट प्रसारित की थी।

पुलिस ने उसके खिलाफ एक शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जिस तरह से इस घटना की रिपोर्टिंग की गई, उससे हिंदू समुदाय के लोगों के बीच डर और भ्रम पैदा हुआ और इससे सांप्रदायिक तनाव भड़क सकता था।

एफआईआर दर्ज किए जाने को चुनौती देते हुए, खान के वकील ने तर्क दिया कि रिपोर्ट में न तो समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा दिया गया था और न ही इसमें ऐसा कोई कंटेंट था जिससे सांप्रदायिक अशांति फैलाने का इरादा झलकता हो।

28 अक्टूबर को पारित अपने आदेश में, अदालत ने पाया कि यह रिपोर्ट हिंसा की एक वास्तविक घटना पर आधारित थी।

अदालत ने गौर किया कि खान के खिलाफ की गई शिकायत में ऐसी कोई विशिष्ट बात, शब्द या कंटेंट नहीं बताया गया है, जिससे BNS की धारा 196(1) के तहत समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा मिला हो या बढ़ावा देने की कोशिश की गई हो।

अदालत ने कहा, "यह दावा कि रिपोर्ट से किसी विशेष समुदाय के लोगों के बीच डर और भ्रम पैदा हुआ और इससे तनाव भड़क सकता था, बहुत ही सामान्य किस्म का आरोप है। जब तक कोई ठोस आरोप न हो जो अपराध के जरूरी तत्वों को स्पष्ट करता हो, तब तक केवल सार्वजनिक आक्रोश या सांप्रदायिक तनाव की संभावना के आधार पर इस कानूनी प्रावधान के तहत आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना उचित नहीं ठहराया जा सकता।"

अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से BNS की धारा 196(1) के तहत प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, इसलिए अदालत ने पुलिस द्वारा दर्ज किए गए मामले को रद्द कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील संकल्प कोचर पेश हुए।

राज्य सरकार की ओर से सरकारी वकील प्रमोद पांडे पेश हुए।

शिकायतकर्ता की ओर से वकील रमन चौबे पेश हुए।

[आदेश पढ़ें]

Uvesh_Khan___Uvesh_Reporter_vs_The_State_Of_Madhya_Pradesh.pdf
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Madhya Pradesh High Court quashes FIR against journalist over report on Ganesh Visarjan procession violence