जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने हाल ही में चार लोगों की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ड्रग्स के एक मामले में कथित तौर पर गलत तरीके से फंसाए जाने के लिए हर एक को ₹50 लाख का मुआवज़ा देने की मांग की थी। इस मामले को बाद में पुलिस ने सबूत न होने की वजह से बंद कर दिया था [जावेद अहमद लोन और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश]।
जस्टिस शहज़ाद अज़ीम ने कहा कि सिर्फ़ FIR दर्ज करने से आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता, जब तक कि उसमें दुर्भावना का कोई तत्व न हो।
कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ FIR दर्ज होने के आधार पर कोई आरोपी मुआवज़े का दावा नहीं कर सकता कि उसे आपराधिक मामले में गलत तरीके से नामज़द किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा, "रिट अधिकार क्षेत्र या निहित शक्तियों के तहत मुआवज़ा एक असाधारण सार्वजनिक कानून उपाय है जो तभी उपलब्ध होता है जब मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन हुआ हो, साथ ही दुर्भावना या प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग हो जिससे साबित होने योग्य नुकसान हुआ हो। संज्ञेय अपराध के बारे में जानकारी मिलने पर FIR दर्ज करना और उसे 'स्वीकार नहीं' (not admitted) के तौर पर बंद कर देना, याचिकाकर्ताओं (जो पहले आरोपी थे) के किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।"
किसी संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर केवल FIR दर्ज करना और बाद में उसे 'स्वीकार न किए जाने' (not admitted) के आधार पर बंद कर देना, (आरोपी के) मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जाता है।जम्मू और कश्मीर उच्च न्यायालय
हाईकोर्ट, जावेद अहमद लोन, राजा इखलाक अकबर, सफीर अहमद गडवाल और बासित खान की दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन पर पहले ड्रग्स की सीमा-पार तस्करी का आरोप लगा था। उनके खिलाफ दर्ज FIR में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 (NDPS एक्ट) की धारा 8A, 27B और 29 का ज़िक्र था।
पुलिस ने कहा कि उन्होंने यह FIR पक्की जानकारी के आधार पर दर्ज की थी कि जम्मू-कश्मीर में लाइन ऑफ कंट्रोल के पार ड्रग्स की तस्करी हो रही थी। यह भी शक था कि गैर-कानूनी ड्रग्स के कारोबार से हुई कमाई को चल और अचल संपत्तियों में लगाया जा रहा था।
हालांकि, जांच के बाद पुलिस ने आखिरकार यह मामला बंद कर दिया क्योंकि ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त और स्वीकार्य सबूत नहीं मिल पाए थे।
इस बीच, आरोपियों ने FIR रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उन्होंने कहा कि वे अच्छे बैकग्राउंड वाले सम्मानित लोग हैं और साधारण तरीके से अपनी आजीविका चलाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उनके खिलाफ दर्ज FIR अस्पष्ट और मनगढ़ंत कहानी पर आधारित थी, खासकर इसलिए क्योंकि उनसे कोई प्रतिबंधित सामान बरामद नहीं हुआ था।
उन्होंने आरोप लगाया कि FIR उन्हें परेशान करने और उनसे जबरन वसूली करने के गलत मकसद से दर्ज की गई थी। इसलिए, उन्होंने राज्य से मुआवज़े की भी मांग की।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि पुलिस ने आपराधिक मामला औपचारिक रूप से बंद कर दिया है, इसलिए याचिकाकर्ताओं (आरोपियों) की FIR रद्द करने की मांग पर विचार करने की ज़रूरत नहीं है।
कोर्ट ने मुआवज़े की उनकी याचिका भी खारिज कर दी, क्योंकि ऐसा कुछ भी नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि FIR दुर्भावना से दर्ज की गई थी या जांच के दौरान उन्हें परेशान किया गया था।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के मुआवज़े के दावे को भी खारिज कर दिया क्योंकि यह गलतफहमी पर आधारित था और इसमें गलत इरादे या मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को साबित करने वाला कोई सबूत नहीं था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील वसीम रमज़ान पेश हुए।
जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से सरकारी वकील फहीम निसार शाह पेश हुए।
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Mere closure of FIR does not entitle accused to compensation: J&K High Court