केरल उच्च न्यायालय ने फिर से दोहराया है कि संवैधानिक लोकतंत्र में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं है, और शैक्षणिक संस्थानों में तो बिल्कुल भी नहीं [श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय बनाम अर्चना पी.एस. व अन्य]।
न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने एक एकल न्यायाधीश के अंतरिम आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इस आदेश में कलाडी स्थित श्री शंकरा संस्कृत विश्वविद्यालय के 16 निलंबित छात्रों को 4 नवंबर से शुरू होने वाली विश्वविद्यालय परीक्षाओं में शामिल होने की अनुमति दी गई थी।
इन छात्रों को तब निलंबित किया गया था, जब उन्होंने कुलपति (वाइस-चांसलर) सिज़ा थॉमस का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया था और बाद में, जब वे अपने कार्यालय से बाहर निकल रही थीं, तो कथित तौर पर उन्हें रोका और उन पर हमला किया।
मामले पर विचार करते हुए, अदालत ने उच्च न्यायालय की एक अन्य खंडपीठ के 2017 के फैसले का हवाला दिया, जो शैक्षणिक संस्थानों के भीतर विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार से संबंधित था।
'डॉ. एंटनी थॉमस बनाम वी.एम. मुहम्मद रफीक व अन्य' शीर्षक वाले उस फैसले में, अदालत ने कहा था कि विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले छात्र निष्कासन (expulsion) के पात्र हो सकते हैं।
2017 के उस फैसले में कहा गया था, "हम यह कहना चाहेंगे कि संवैधानिक लोकतंत्र में धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई जगह नहीं है, और शैक्षणिक संस्थानों में तो बिल्कुल भी नहीं। जो कोई भी किसी शैक्षणिक संस्थान में ऐसी गतिविधियों में शामिल होता है, वह निष्कासित या रस्टिकेट (संस्थान से निकाला) किए जाने का पात्र हो जाता है। शैक्षणिक संस्थान शिक्षा देने के लिए होते हैं, न कि राजनीति के लिए। राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते किसी शैक्षणिक संस्थान को बंधक नहीं बना सकते, और न ही सभ्य छात्रों के शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार में बाधा डाल सकते हैं।"
फैसले में डॉ. बी.आर. अंबेडकर के उन शब्दों का भी हवाला दिया गया, जो उन्होंने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में भारत का संविधान पेश करते समय कहे थे।
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No place for dharnas, hunger strikes, satyagraha in educational institutions: Kerala High Court