सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें तमिलनाडु सरकार के एक आदेश (GO) को रद्द कर दिया गया था। इस आदेश के तहत, पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों के लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद 'पिछड़े वर्ग के मुस्लिम' के रूप में माने जाने की अनुमति दी गई थी [द सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट बनाम समीर अहमद एन]।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने फैसला सुनाया कि जो व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपना लेता है, वह धर्म परिवर्तन से पहले जिस सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग का हिस्सा था, उसे मिलने वाले कल्याणकारी लाभों का दावा नहीं कर सकता।
अदालत ने कहा, "जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी अन्य सामाजिक व्यवस्था में चला जाता है, वह केवल धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी सामाजिक पिछड़ेपन की स्थिति के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत विशेष लाभ (affirmative action) का दावा नहीं कर सकता। पिछली सामाजिक व्यवस्था में झेला गया पिछड़ापन अपने आप नए धर्म में भी लागू नहीं हो जाता, जिससे उसे उस नए धर्म में भी 'पिछड़े वर्ग' का दर्जा मिल जाए।"
अदालत ने यह भी कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, अनुसूचित जाति का दर्जा केवल उन्हीं लोगों को मिल सकता है जो हिंदू, बौद्ध या सिख हैं।
अदालत ने माना, "संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश के पैरा 3 के अनुसार, जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। इसलिए, यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे धर्म में परिवर्तित हो जाता है जिसका उल्लेख इस आदेश में नहीं है, तो वह अपनी पिछली जाति से जुड़ा अनुसूचित जाति का दर्जा खो देता है। ऐसे में, वह संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत पिछड़े वर्ग के लिए मिलने वाले उन विशेष लाभों का दावा नहीं कर सकता, जो अनुसूचित जाति का सदस्य होने पर ही मिलते हैं।"
जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तित हो जाता है, वह केवल धर्म-परिवर्तन से पहले की अपनी सामाजिक स्थिति से जुड़े पिछड़ेपन के आधार पर विशेष संरक्षण (affirmative action) का दावा नहीं कर सकता।सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने आगे कहा कि अगर कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन के बाद वापस हिंदू धर्म अपना लेता है, तो भी वह अपने पुराने पिछड़े वर्ग के दर्जे को स्वतः वापस पाने का हकदार नहीं हो जाएगा।
अदालत ने कहा, "वह सामाजिक पिछड़ापन, जो धर्म परिवर्तन से पहले उस व्यक्ति के दर्जे का आधार था, वह धर्म परिवर्तन के बाद किसी अन्य अधिसूचित पिछड़े वर्ग का सदस्य बनने के लिए कानूनी आधार नहीं बन सकता। इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में चला जाता है और फिर वापस हिंदू सामाजिक व्यवस्था में लौट आता है, तो अनुच्छेद 16(4) के तहत उसे मिलने वाले विशेष लाभ (affirmative action) का हकदार माना जाए या नहीं, यह केवल उसके पुराने दर्जे के आधार पर तय नहीं किया जा सकता।"
यह मामला 9 मार्च 2024 के एक सरकारी आदेश (GO) से जुड़ा था, जिसमें पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों (denotified communities) और अनुसूचित जातियों के लोगों को इस्लाम अपनाने के बाद 'पिछड़े वर्ग के मुस्लिम' (Backward Class Muslims) के रूप में मानने की अनुमति दी गई थी।
तूतीकोरिन जिले में एक हिंदू दंपत्ति के घर जन्मे समीर अहमद (पहले नाम परमशिवम था) ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने मांग की थी कि उन्हें अभी भी एक पिछड़े समुदाय का हिस्सा माना जाए।
अहमद ने 2015 में इस्लाम अपना लिया था, अपना नाम बदल लिया था और इस्लामी रीति-रिवाजों से शादी की थी। बाद में उन्होंने एक सामुदायिक प्रमाण पत्र (community certificate) के लिए आवेदन किया, जिसमें उन्हें "मुस्लिम लेब्बाई" (Muslim Lebbai) के रूप में पहचाना जाना था। यह उन सात समुदायों में से एक है, जिन्हें राज्य सरकार के आदेश के तहत 'पिछड़े वर्ग के मुस्लिम' के रूप में मान्यता प्राप्त है।
तहसीलदार ने उनका आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद अहमद हाई कोर्ट गए, लेकिन कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और 'पिछड़े वर्ग के मुस्लिमों' को मान्यता देने वाले राज्य सरकार के मार्च 2024 के आदेश को असंवैधानिक करार दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि कोई व्यक्ति इस्लाम तो अपना सकता है, लेकिन आरक्षण के उद्देश्य से इस्लाम के भीतर किसी विशेष जाति या समुदाय को नहीं अपना सकता। कोर्ट ने सरकारी आदेश को "न केवल असंवैधानिक, बल्कि गैर-इस्लामिक" भी बताया। अदालत ने कहा कि इस्लाम का मूल सिद्धांत समानता है, न कि सामाजिक पदानुक्रम (social hierarchy)।
राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन आज सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी।
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Person who converts from Hinduism to Islam can't claim Backward Class Muslim status: Supreme Court