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आरटीआई आवेदकों के लिए सार्वजनिक प्राधिकरण को तीसरे पक्ष से जानकारी जुटाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: बॉम्बे हाईकोर्ट

कोर्ट ने कहा कि RTI एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत किसी सरकारी संस्था (पब्लिक अथॉरिटी) के लिए RTI आवेदकों को संतुष्ट करने के मकसद से तीसरे पक्ष से जानकारी हासिल करना अनिवार्य हो।

Bar & Bench

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को फैसला सुनाया कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI एक्ट) के तहत किसी सरकारी संस्था पर यह कानूनी बाध्यता नहीं है कि वह किसी निजी संस्था से जानकारी इकट्ठा करे या हासिल करे, सिर्फ़ इसलिए ताकि उसे RTI आवेदक को उपलब्ध कराया जा सके [सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम योगेश मेहता और अन्य]।

जस्टिस मनीष पिटाले और श्रीराम वी. शिरसात की डिवीज़न बेंच ने सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन (CIC) के कुछ आदेशों को रद्द करते हुए यह बात कही।

CIC ने सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) से कुछ जानकारी इकट्ठा करने का निर्देश दिया था, ताकि वह जानकारी RTI आवेदकों को दी जा सके।

SEBI और BSE ने हाईकोर्ट में इन निर्देशों को चुनौती दी। उन्हें राहत देते हुए कोर्ट ने कहा,

"(RTI एक्ट के) प्रावधानों से यह पता नहीं चलता कि कोई पब्लिक अथॉरिटी - जैसे इस मामले में SEBI, जो एक रेगुलेटरी बॉडी है और जिसे अपने गवर्निंग कानून के तहत जानकारी देने के लिए थर्ड पार्टी को बुलाने का अधिकार है - उस पर ऐसी जानकारी मांगने वाले लोगों की संतुष्टि के लिए थर्ड पार्टी से जानकारी हासिल करने की कोई बाध्यता है।"

Justices Manish Pitale and Shreeram Shirsat (Bombay)

CIC ने RTI एक्ट के तहत "जानकारी" की परिभाषा की व्याख्या करते हुए कहा था कि SEBI न केवल अपने रिकॉर्ड में पहले से मौजूद डेटा देने के लिए बाध्य है, बल्कि नागरिकों के सवालों का जवाब देने के लिए BSE जैसी प्राइवेट थर्ड पार्टी से भी सक्रिय रूप से जानकारी इकट्ठा करने के लिए बाध्य है।

इसलिए, हाईकोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि क्या डेटा मांगने की रेगुलेटर (जैसे SEBI) की शक्ति का हवाला देकर उसे RTI आवेदकों के लिए थर्ड-पार्टी की जानकारी इकट्ठा करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

SEBI ने तर्क दिया था कि किसी रेगुलेटर को RTI आवेदकों के लिए जानकारी इकट्ठा करने वाले एजेंट के तौर पर काम करने के लिए मजबूर करना RTI एक्ट के कानूनी अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

हाईकोर्ट को यह तर्क सही लगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पब्लिक अथॉरिटी को केवल वही जानकारी देनी होती है जो RTI अनुरोध जमा किए जाने के समय उसके पास वास्तव में मौजूद होती है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी सहारा लिया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया था कि RTI एक्ट पब्लिक अथॉरिटी पर ऐसी जानकारी इकट्ठा करने या संकलित करने की कोई बाध्यता नहीं डालता जो उसके पास पहले से मौजूद नहीं है।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि CIC ने इस मामले में अपनी सीमा का उल्लंघन किया है।

"हम पाते हैं कि CIC का उक्त तर्क सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्पष्ट की गई कानूनी स्थिति के विपरीत है और इसलिए, इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है और विवादित आदेशों को रद्द और खारिज किया जाना चाहिए।"

नतीजतन, कोर्ट ने चुनौती दिए गए CIC आदेशों को रद्द कर दिया।

SEBI की ओर से सीनियर एडवोकेट JJ भट्ट, साथ में एडवोकेट मिशा पटेल, ओमप्रकाश झा, शिवानी कुंभोजकर और मुग्धा नारकर (जिन्हें 'द लॉ पॉइंट' ने ब्रीफ किया था) पेश हुए।

BSE की ओर से सीनियर एडवोकेट पेसी मोदी और एडवोकेट कल्पना देसाई, किंगशुक बनर्जी, अर्नव मोहंती, ऋत्विक कुलकर्णी, अर्नब रे और सूर्या रविकुमार (जिन्हें 'खेतान एंड कंपनी' ने ब्रीफ किया था) पेश हुए।

[फैसला पढ़ें]

SEBI_v__Yogesh_Mehta.pdf
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Public authority can’t be forced to get info from third parties for RTI applicants: Bombay High Court