हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों के बारे में बढ़ती जागरूकता ने सार्वजनिक संस्थानों से उम्मीदें बढ़ा दी हैं, और उन्हें सौंपी गई शक्तियों के लिए उन्हें जवाबदेह बने रहना होगा।
उन्होंने आगे कहा कि आज नागरिक अपने अधिकारों और उन्हें चलाने वाली संस्थाओं के बारे में ज़्यादा जागरूक हैं। सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा कि इससे संस्थाओं के लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि वे उन्हें सौंपी गई शक्तियों का हिसाब दें।
जस्टिस नाथ ने कहा, "हम ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जो पहले कभी नहीं देखा गया। आज लोग अपने अधिकारों और उन्हें चलाने वाली संस्थाओं के बारे में कहीं ज़्यादा जागरूक हैं। यह बदलाव लंबे समय से आ रहा था... लेकिन यह बढ़ती जागरूकता अपने साथ एक गंभीर ज़िम्मेदारी भी लाती है। उम्मीदें बढ़ती हैं, और सही भी हैं। अगर नागरिकों से संस्थाओं का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है, तो संस्थाओं को भी उन्हें सौंपी गई शक्तियों का हिसाब देने के लिए उतना ही तैयार रहना चाहिए।"
उन्होंने कहा कि संस्थाओं को सवाल-जवाब के लिए तैयार रहना चाहिए।
जस्टिस नाथ ने कहा, "यह उनकी ताकत का हिस्सा है, न कि उनके लिए कोई खतरा।"
वे 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) द्वारा "न्याय वितरण का भविष्य: नवाचार, समावेश और ईमानदारी" विषय पर आयोजित एक लेक्चर में बोल रहे थे।
इस कार्यक्रम में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस वी. मोहना और ज़ाम्बिया सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आभा नायर पटेल समेत अन्य वक्ता भी शामिल हुए।
अपने संबोधन में, जस्टिस नाथ ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि न्याय के सिद्धांत उन लोगों के वास्तविक अनुभव में झलकने चाहिए जो अदालतों का दरवाज़ा खटखटाते हैं।
जस्टिस नाथ ने कहा, "न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता केवल फैसलों, भाषणों या कानूनों की भाषा तक सीमित नहीं रह सकते। उन्हें उन लोगों के वास्तविक अनुभव में महसूस किया जाना चाहिए जो इस सिस्टम से जुड़ते हैं।"
उन्होंने कहा कि यह अदालतों के मामले में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिन्हें अक्सर अधिकारों का संरक्षक कहा जाता है। जस्टिस नाथ ने कहा कि आज़ादी और समानता जैसी अवधारणाओं का असली मतलब तब समझ आता है जब उन्हें न्याय प्रणाली के सामने आने वाले लोगों के अनुभवों के आधार पर परखा जाता है।
उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि प्रभावी न्याय वितरण सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी केवल जजों की नहीं है। उन्होंने कहा कि वकील, कोर्ट के कर्मचारी और न्यायिक प्रक्रिया में शामिल हर व्यक्ति मुक़दमा लड़ने वाले व्यक्ति के अनुभव में योगदान देता है।
जस्टिस नाथ ने आगे कहा कि हालांकि न्याय प्रणाली के मूल मूल्यों को बनाए रखा जाना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अदालतों को काम करने के हर पारंपरिक तरीके का पालन करते रहना चाहिए।
टेक्नोलॉजी और समावेश की भूमिका पर, जस्टिस वी. मोहना ने कहा कि न्याय तक पहुँच को केवल कोर्टरूम तक शारीरिक रूप से पहुँचने की क्षमता के तौर पर नहीं समझा जाना चाहिए। जस्टिस मोहना ने न्यायपालिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के बारे में बात की, जिसमें संविधान पीठ की सुनवाई की AI-की मदद से ट्रांसक्रिप्शन भी शामिल है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि तकनीकी इनोवेशन इंसानी निगरानी और संवैधानिक मूल्यों के दायरे में ही होना चाहिए।
जस्टिस मोहना ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा कि न्याय देने की प्रक्रिया का भविष्य सिर्फ़ तेज़ी और टेक्नोलॉजी पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी केंद्रित होना चाहिए कि अदालतें सभी की पहुँच में हों और उन पर भरोसा किया जा सके।
ज़ाम्बिया सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस आभा नायर पटेल ने कहा कि इनोवेशन, सबको साथ लेकर चलने (इनक्लूज़िविटी) और ईमानदारी (इंटीग्रिटी) को न्याय देने की प्रक्रिया के अलग-अलग पहलू नहीं, बल्कि ऐसे सिद्धांत माना जाना चाहिए जो एक साथ काम करें।
उन्होंने कहा, "मेरा मानना है कि ईमानदारी के बिना इनोवेशन खतरनाक है। सबको साथ लेकर चलने की भावना के बिना ईमानदारी अधूरी है। इनोवेशन के बिना सबको साथ लेकर चलने की कोशिश अक्सर इतनी धीमी होती है कि उसका कोई खास असर नहीं होता।"
जस्टिस पटेल ने कहा कि हालांकि टेक्नोलॉजी अदालतों को देरी से निपटने और न्याय तक पहुँच बेहतर बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन अगर इसे बिना ज़रूरी सुरक्षा उपायों के लागू किया जाए, तो यह मौजूदा असमानताओं को और बढ़ा सकती है।
उन्होंने कहा, "बिना सोचे-समझे किया गया इनोवेशन असमानता को खत्म नहीं करता। यह बस उस असमानता को डिजिटल रूप दे सकता है।"
उन्होंने आगे चेतावनी दी कि अदालतों में इस्तेमाल होने वाली टेक्नोलॉजी न्यूट्रल (तटस्थ) नहीं होती, खासकर तब जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम को ऐसे पुराने डेटा पर ट्रेन किया जाता है जिसमें पहले से मौजूद भेदभाव हो सकते हैं।
जस्टिस पटेल ने कहा, "अदालत में टेक्नोलॉजी कोई न्यूट्रल साधन नहीं है। सज़ा सुनाने के पुराने डेटा पर ट्रेन किया गया एल्गोरिदम पुराने भेदभावों को ही दोहराएगा, जब तक कि हम इसे रोकने के लिए सुरक्षा उपाय न करें। वर्चुअल सुनवाई से स्मार्टफोन और अच्छे इंटरनेट कनेक्शन वाले मुक़दमेबाज़ की पहुँच तो बढ़ सकती है, लेकिन जिनके पास ये दोनों चीज़ें नहीं हैं, वे चुपचाप बाहर हो सकते हैं।"
उन्होंने सुझाव दिया कि न्याय प्रणाली में अपनाए जाने वाले हर तकनीकी टूल का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि क्या इससे नतीजों में निष्पक्षता आती है और क्या इससे उन लोगों के लिए न्याय तक पहुँच बेहतर होती है जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
उन्होंने अदालतों में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट न्यायिक और पेशेवर मानक तय करने की भी बात कही।
जस्टिस पटेल ने कहा, "मेरा सुझाव है कि आने वाले दशकों में ईमानदारी बदलाव का विरोध करके नहीं, बल्कि बदलाव को सही तरीके से मैनेज करके ही सुनिश्चित की जा सकेगी। हमें अपनी अदालतों में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट न्यायिक और पेशेवर मानकों की ज़रूरत है - ऐसे मानक जो खुद न्यायपालिका बनाए, न कि बाहर से थोपे जाएं, और न ही उन्हें बस संयोग से विकसित होने के लिए छोड़ दिया जाए।"
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Public institutions must be open to questioning: Supreme Court Justice Vikram Nath