Delhi High Court with POCSO Act  
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बार-बार कोर्ट के समन से बच्चों के यौन उत्पीड़न पीड़ितों को मानसिक कष्ट और दोबारा आघात पहुँच सकता है: दिल्ली हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने कहा कि POCSO मामलों में बच्चों की प्रत्यक्ष उपस्थिति की आवश्यकता को पूरा करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे तरीकों को अपनाया जा सकता है।

Bar & Bench

दिल्ली हाईकोर्ट ने अदालतों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि यौन उत्पीड़न की शिकार नाबालिग पीड़ितों को ट्रायल या ज़मानत की कार्यवाही के दौरान बार-बार न बुलाया जाए, क्योंकि इससे उन्हें मानसिक तनाव और दोबारा सदमा पहुँच सकता है।

जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने कहा कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) में यह अनिवार्य है कि बच्चों के अनुकूल प्रक्रियाओं को अपनाया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पीड़ित बच्चे को बार-बार या अनावश्यक रूप से कोर्ट के सामने पेश न होना पड़े।

कोर्ट ने आगे कहा कि बच्चों की गवाही दर्ज करने के लिए कोर्ट को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे कोर्ट में उनकी शारीरिक मौजूदगी की ज़रूरत कम हो जाए।

कोर्ट ने आगे कहा, "ज़मानत याचिकाओं पर विचार करते समय, भले ही पीड़ित को अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन एक बार जब ज़मानत दिए जाने के संबंध में पीड़ित की आपत्तियां या विचार दर्ज कर लिए जाते हैं, तो सुनवाई की हर तारीख पर पीड़ित की शारीरिक या वर्चुअल मौजूदगी के लिए बार-बार ज़ोर देने से बचना चाहिए।"

Justice Swarana Kanta Sharma

बेंच ने ये टिप्पणियाँ 2022 में दर्ज एक यौन उत्पीड़न मामले की तीन नाबालिग पीड़ित लड़कियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं।

याचिका के अनुसार, वे लापता हो गई थीं और बाद में दिल्ली में मिलीं, जहाँ उन्होंने आरोप लगाया कि दो दिनों तक कई आरोपियों ने उनके साथ यौन उत्पीड़न किया और उन्हें धमकाया। मामले में बलात्कार, मानव तस्करी और POCSO एक्ट के तहत अपराधों सहित कई आरोप जोड़े गए।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि उन्हें गवाही देने के लिए बार-बार बुलाया गया, जिससे उन्हें मानसिक पीड़ा हुई। पीड़ितों में से एक को उसकी गवाही पूरी होने से पहले नौ बार बुलाया गया था, जबकि दूसरों को भी कई बार बुलाया गया।

ट्रायल कोर्ट ने तो मानसिक पीड़ा के कारण पेश न हो पाने पर एक नाबालिग पीड़ित के खिलाफ जमानती वारंट भी जारी कर दिया था। हाई कोर्ट ने पहले उस वारंट को रद्द कर दिया और बाद में ट्रायल की कार्यवाही के दौरान पीड़ित बच्चों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से जुड़े व्यापक मुद्दों की जाँच की।

एक विस्तृत फैसले में, हाईकोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस मुद्दे पर अदालतों द्वारा कई दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं और ट्रायल कोर्ट/विशेष अदालतों को उनका एक समान रूप से पालन करना चाहिए।

एडवोकेट प्राची दुबे ने इस मामले में एमिकस क्यूरी (अदालत के सलाहकार) के तौर पर काम किया।

एडवोकेट नितिन सलूजा, निमिषा मेनन, प्रान्या मदन और अंकिता तालुकदार ने याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व किया।

अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) मनोज पंत ने दिल्ली पुलिस का प्रतिनिधित्व किया।

[फैसला पढ़ें]

Minor_Child_K___Ors_v_State_NCT_of_Delhi___Ors.pdf
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Repeated court summons can cause distress and re-trauma to child sexual assault victims: Delhi High Court