Right to be forgotten  
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'भूल दिए जाने का अधिकार': दिल्ली हाईकोर्ट ने दिव्यांग मुक़दमेबाज़ों की निजता की सुरक्षा के लिए नीति की वकालत की

चीफ़ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट का एडमिनिस्ट्रेटिव विंग गाइडलाइंस बनाने पर फ़ैसला लेगा।

Bar & Bench

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को उन दिव्यांग लोगों की प्राइवेसी सुनिश्चित करने के लिए गाइडलाइंस की वकालत की, जो कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते हैं और नहीं चाहते कि उनकी निजी जानकारी सार्वजनिक की जाए।

चीफ़ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीज़न बेंच ने कहा कि यह मामला बहुत अहम है।

कोर्ट ने कहा है कि ऐसी गाइडलाइंस बनाने का उसका आदेश हाई कोर्ट के एडमिनिस्ट्रेटिव विंग के सामने रखा जाएगा, जो लोगों की प्राइवेसी पक्की करने के लिए पॉलिसी से जुड़ा फ़ैसला लेगा।

कोर्ट ने आदेश दिया, "ऊपर बताई गई बातों और हालात को देखते हुए, हमारी राय है कि इस कोर्ट को एडमिनिस्ट्रेटिव लेवल पर एक व्यापक पॉलिसी फ़ैसला लेने और सही गाइडलाइंस बनाने की ज़रूरत है, ताकि उन लोगों की प्राइवेसी के अधिकार को पक्का किया जा सके जो किसी तरह की विकलांगता से जूझ रहे हैं और अपनी पहचान और उनसे जुड़ी जानकारी को छिपाना या हटाना चाहते हैं। इसलिए, इस आदेश को कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के सामने रखा जाए, जो गाइडलाइंस बनाने के लिए पॉलिसी फ़ैसला लेने के मकसद से हाईकोर्ट के एडमिनिस्ट्रेटिव विंग में इस मामले को उठाएंगे।"

बेंच ने कहा कि इस मामले पर 29 सितंबर को फिर से विचार किया जाएगा।

Chief Justice Devendra Kumar Upadhyaya and Justice Tejas Karia

खास बात यह है कि दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में 'भूल जाने के अधिकार' (right to be forgotten) को मान्यता दी थी और कोर्ट के आदेशों में निजी जानकारी को छिपाने (मास्किंग) के लिए गाइडलाइंस तय की थीं।

जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा था कि लोग ऑनलाइन न्यायिक रिकॉर्ड से अपनी निजी जानकारी हटाने या छिपाने की मांग कर सकते हैं, अगर उस जानकारी के लगातार उपलब्ध रहने से उनकी प्राइवेसी, सम्मान और प्रतिष्ठा को बहुत ज़्यादा नुकसान पहुँचता है।

डिविजन बेंच ने आज यह आदेश एक दिव्यांग व्यक्ति की अपील पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें उसने कोर्ट रिकॉर्ड में अपने बारे में कुछ जानकारी छिपाने या हटाने की मांग की थी।

इससे पहले एक सिंगल-जज ने यह याचिका खारिज कर दी थी। उन्होंने कहा था कि कोई बाध्यकारी पॉलिसी न होने की वजह से, कोर्ट संविधान के आर्टिकल 226 के तहत अपनी विवेकाधीन शक्ति का इस्तेमाल करके जानकारी छिपाने या हटाने का ऐसा कोई अधिकार नहीं बना सकता।

उस व्यक्ति ने डिविजन बेंच के सामने अपील में इस आदेश को चुनौती दी।

डिविजन बेंच ने इस मामले में एक पॉलिसी बनाने की ज़रूरत बताने के साथ-साथ हाईकोर्ट, केंद्र सरकार और कुछ वेब पोर्टलों को नोटिस भी जारी किया।

याचिकाकर्ता की ओर से वकील राहुल बजाज पेश हुए।

हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से वकील सौरभ सेठ के साथ नीलांप्रीत कौर, अभि‍रूप राठौर, कबीर देव और सुखवीर सिंह पेश हुए।

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