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जब्त किए गए दस्तावेजो मे केस दर्ज होने से पहले ही FIR नंबर दर्ज था: फर्जी मुद्रा मामले मे दिल्ली अदालत ने व्यक्ति को बरी किया

अदालत ने ₹7.5 लाख की नकली करेंसी चलाने के आरोपी एक व्यक्ति को बरी कर दिया।

Bar & Bench

दिल्ली की एक अदालत ने बुधवार को नकली भारतीय करेंसी नोट रखने और उन्हें चलाने के आरोपी एक व्यक्ति को बरी कर दिया। अदालत ने पुलिस की जांच में कई कमियां पाईं, जिनमें ज़ब्ती के उन दस्तावेज़ों पर FIR नंबर का होना शामिल था जो FIR दर्ज होने से पहले ही तैयार कर लिए गए थे [State v. Deepak Mandal]।

राउज़ एवेन्यू कोर्ट के जज अमित बंसल ने यह भी पाया कि पुलिस उन बैगों को ज़ब्त करने में नाकाम रही जिनमें कथित तौर पर नकली करेंसी मिली थी, जबकि अभियोजन पक्ष ने इन्हीं बैगों को बरामदगी का स्रोत बताया था।

कोर्ट ने कहा कि FIR दर्ज होने से पहले तैयार किए गए दस्तावेज़ों पर FIR नंबर का होना, बरामदगी के बारे में अभियोजन पक्ष के दावे पर गंभीर संदेह पैदा करता है।

कोर्ट ने कहा, "ऊपर बताए गए दस्तावेज़ों के सबसे ऊपर लिखा FIR नंबर साफ़ तौर पर बताता है कि या तो FIR कथित बरामदगी से पहले ही दर्ज कर ली गई थी या फिर FIR दर्ज होने के बाद ये नंबर दस्तावेज़ों में जोड़े गए थे। दोनों ही स्थितियों में, यह अभियोजन पक्ष के दावे की सच्चाई पर गंभीर सवाल उठाता है और जिस तरह से अभियोजन पक्ष ने नकली भारतीय करेंसी नोटों (FICN) की बरामदगी का दावा किया है, उस पर बहुत ज़्यादा संदेह पैदा करता है।"

कोर्ट दीपक मंडल के मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसे 10 अगस्त 2018 को गिरफ़्तार किया गया था। आरोप है कि स्पेशल सेल की एक टीम ने उसे 9 अगस्त 2018 की रात दिल्ली के खानपुर में DTC बस डिपो के पास पकड़ा था।

मंडल पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 489B और 489C के तहत नकली भारतीय करेंसी नोट रखने और उन्हें चलाने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष का दावा था कि वह ₹2 लाख की असली करेंसी के बदले बेचने के लिए ₹4 लाख मूल्य के नकली ₹2,000 के नोट लाया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, एक पुलिस अधिकारी, HC मनोज ने नकली ग्राहक (डिकॉय कस्टमर) की भूमिका निभाई। पुलिस ने ₹2,000 के नोटों के आकार के कागज़ के 98 टुकड़ों का एक नकली बंडल तैयार किया, जिसमें सबसे ऊपर और सबसे नीचे ₹2,000 का एक-एक असली नोट रखा गया था। यह बंडल मनोज को दिया गया, जिसे डील के दौरान मंडल को देना था।

अभियोजन पक्ष का आरोप है कि मंडल ने नकली ग्राहक को दो बंडल सौंपे जिनमें ₹4 लाख मूल्य के ₹2,000 के 200 नकली नोट थे। इसके अलावा, मंडल के पास मौजूद एक बैग से ₹3.5 लाख मूल्य के ₹2,000 के 175 नकली नोट भी कथित तौर पर बरामद किए गए।

बाद में इन नोटों को नासिक स्थित करेंसी नोट प्रेस भेजा गया, जहाँ से रिपोर्ट मिली कि ये नोट नकली थे। हालांकि, कोर्ट को प्रॉसिक्यूशन के मामले में कई कमियां मिलीं और उसने माना कि मंडल को 'बेनिफिट ऑफ़ डाउट' (संदेह का लाभ) मिलना चाहिए।

कोर्ट ने देखा कि कथित बरामदगी 9 अगस्त, 2018 को रात लगभग 9:50 बजे हुई थी। पुलिस 10 अगस्त की सुबह लगभग 4 बजे तक मौके पर ही रही, जब FIR दर्ज कराने के लिए 'रुक्का' (पुलिस अधिकारी की लिखित रिपोर्ट) थाने ले जाया गया।

ड्यूटी ऑफिसर को सुबह 4:40 बजे रुक्का मिला और उसके बाद FIR दर्ज की गई; एंडोर्समेंट से पता चला कि यह प्रक्रिया सुबह 7 बजे तक चलती रही।

कोर्ट ने पाया कि साइट प्लान और ज़ब्ती से जुड़े कई दस्तावेज़ - जिनमें 175 नकली नोट, मंडल द्वारा सौंपे गए ₹4 लाख के नकली नोट, नकली नोटों की गड्डी और दो असली नोट शामिल थे - FIR दर्ज होने से पहले ही तैयार कर लिए गए थे।

फिर भी, इन सभी दस्तावेज़ों पर FIR नंबर लिखा हुआ था।

कोर्ट ने पाया कि प्रॉसिक्यूशन ने इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि FIR दर्ज होने से पहले तैयार किए गए दस्तावेज़ों पर FIR नंबर कैसे आ गया।

कोर्ट ने कहा कि इससे दो संभावनाएं बनती हैं: या तो कथित बरामदगी से पहले ही FIR दर्ज कर ली गई थी, या फिर FIR दर्ज होने के बाद दस्तावेज़ों में FIR नंबर डाला गया था।

जज ने माना कि दोनों ही स्थितियों में, इस बात ने प्रॉसिक्यूशन के पक्ष को बुरी तरह कमज़ोर कर दिया और कथित बरामदगी पर "काफ़ी संदेह" पैदा किया।

उन्होंने यह भी गौर किया कि काले रंग का शोल्डर बैग और काले रंग के दो पॉलीथीन बैग, जिनमें कथित तौर पर नकली नोट थे, कभी ज़ब्त ही नहीं किए गए। कोर्ट ने माना कि ये "महत्वपूर्ण सबूत" थे और इनके ज़ब्त न होने से कथित बरामदगी की सच्चाई पर गंभीर संदेह पैदा हुआ।

कोर्ट ने यह भी पाया कि भीड़-भाड़ वाली सार्वजनिक जगह पर कथित बरामदगी होने के बावजूद पुलिस स्वतंत्र गवाहों को शामिल करने में नाकाम रही। जिन लोगों ने कथित तौर पर छापेमारी में शामिल होने से इनकार किया था, उनके बारे में कोई जानकारी दर्ज नहीं की गई और न ही उन्हें कोई नोटिस भेजा गया।

कोर्ट ने इस बात को भी अहम माना कि इंस्पेक्टर ईश्वर सिंह, जिन्होंने कथित तौर पर छापेमारी की निगरानी की थी और जिनके साथ गुप्त जानकारी साझा की गई थी, उन्हें न तो प्रॉसिक्यूशन गवाह के तौर पर पेश किया गया और न ही उनसे पूछताछ की गई।

इसलिए, कोर्ट ने माना कि पुलिस अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में नाकाम रही और मंडल को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

मंडल की ओर से एमिकस क्यूरी RHA सिकंदर पेश हुए।

राज्य की ओर से एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर ज्ञान प्रकाश राय पेश हुए।

[आदेश पढ़ें]

State_v__Deepak_Mandal.pdf
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Seizure documents mentioned FIR number before case was even registered: Delhi court acquits man in fake currency case