केरल उच्च न्यायालय ने सोमवार को अधिकारियों को सबरीमाला स्वर्ण चोरी मामले में अभियोजन की मंजूरी प्राप्त करने की प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया [स्वतः संज्ञान बनाम केरल राज्य व अन्य]।
यह मामला सबरीमाला मंदिर के गर्भगृह (श्रीकोविल) में दरवाज़ों के फ्रेम, किनारों और छत पर लगे सोने की परत वाले तांबे के आवरणों से कथित तौर पर सोना निकाल लेने (गबन करने) से जुड़ा है।
न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी और न्यायमूर्ति के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने यह निर्देश तब दिया, जब विशेष जांच दल (SIT) ने अदालत को सूचित किया कि उसने इस मामले की जांच पूरी कर ली है।
अदालत ने SIT को निर्देश दिया कि अभियोजन की मंजूरी (prosecution sanction) मिलने के बाद, वे बिना किसी देरी के इस मामले की अंतिम रिपोर्ट संबंधित अदालत में पेश करें।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, "इन परिस्थितियों को देखते हुए, हम संबंधित अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे मामले में तेजी लाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं। साथ ही, यह सुनिश्चित करें कि बिना किसी देरी के जरूरी कानूनी सलाह ली जाए और अभियोजन की मंजूरी के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अनुरोध रखा जाए।"
यह मामला तब सामने आया जब 'द्वारपालकों' (Dwarapalakas) से सोना गायब होने के आरोप लगे। ये द्वारपालक और 'श्रीकोविल' (Sreekovil) की छत व दीवारों पर लगी सोने की परतें 1999 में एक भक्त द्वारा दान की गई थीं।
2019 में, मरम्मत के काम के लिए इन सोने की परतों को हटाकर चेन्नई ले जाया गया था। हालांकि, उस समय त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) द्वारा तैयार किए गए रिकॉर्ड में इन परतों को 'सोने की परत चढ़ी तांबे की प्लेट' के बजाय केवल 'तांबे की प्लेट' बताया गया था।
मरम्मत के बाद जब इन प्लेटों को मापा गया, तो कई किलोग्राम सोना गायब मिला, जिससे कथित चोरी का पता चला।
2025 में, जब विशेष आयुक्त ने सोने की परत वाली इन प्लेटों को हटाए जाने के बारे में कोर्ट को सूचित किया, तो कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए मामले की जांच के लिए एक SIT का गठन किया।
तब से कोर्ट इस मामले की प्रगति पर नज़र रख रही है।
कोर्ट का यह आदेश एक 'इन-कैमरा' (बंद कमरे में) सुनवाई के दौरान दिया गया।
SIT के प्रमुख, IPS शशीधरन ने कोर्ट को बताया कि दरवाज़े के फ्रेम (doorframes) से जुड़े मामले की जांच पूरी हो चुकी है।
हालांकि, SIT ने 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' (Prevention of Corruption Act, 1988) की धारा 19(1)(c) के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति (prosecution sanction) नहीं मांगी थी, जो चार्जशीट दाखिल करने से पहले ज़रूरी होती है।
उन्होंने बताया कि हालांकि SIT ने तथ्यात्मक रिपोर्ट और चार्जशीट का ड्राफ्ट तैयार कर लिया था, लेकिन वे मुकदमा चलाने की अनुमति मांगने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सके, क्योंकि उन्हें सहायक कानूनी सलाहकार (Assistant Legal Advisor) की राय का इंतज़ार था। कोर्ट को बताया गया कि सलाहकार की नियुक्ति तो हो गई है, लेकिन उन्होंने अभी तक अपना पदभार नहीं संभाला है।
अभियोजन महानिदेशक (Director General of Prosecution) टी. आसफ अली ने कोर्ट को भरोसा दिलाया कि यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे कि सलाहकार जल्द से जल्द अपना पदभार संभालें और बिना किसी और देरी के ज़रूरी कानूनी राय दें।
इसके बाद कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मुकदमा चलाने की अनुमति का अनुरोध सक्षम प्राधिकारी (competent authority) के समक्ष रखा जाए।
कोर्ट ने SIT को यह भी निर्देश दिया कि वह 'द्वारपालक' मूर्तियों से जुड़े अलग मामले की जांच पूरी करे और कोर्ट द्वारा तय की गई समय-सीमा के भीतर मुकदमा चलाने की अनुमति मांगे।
[आदेश पढ़ें]
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SIT completes probe into Sabarimala gold theft; Kerala High Court urges speedy prosecution sanction