इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया कि उत्तर प्रदेश में किसी प्राइवेट प्रॉपर्टी में धार्मिक प्रार्थना सभा करने के लिए किसी इजाज़त की ज़रूरत नहीं है [मरानाथ फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ बनाम स्टेट ऑफ़ यूपी और 2 अन्य]।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार की इस बात को ध्यान में रखते हुए यह फैसला सुनाया कि कानून में ऐसी कोई अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं है।
इस तरह, कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मौलिक अधिकार का हिस्सा होने वाले काम को करने के लिए कानून के तहत किसी अनुमति की ज़रूरत नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि यह इस शर्त पर लागू होगा कि धार्मिक प्रार्थना सभा केवल प्रॉपर्टी के निजी परिसर में ही की जाए।
कोर्ट दो मिलती-जुलती याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिन्हें मरानाथा फुल गॉस्पेल मिनिस्ट्रीज़ और इमैनुएल ग्रेस चैरिटेबल ट्रस्ट ने दायर किया था।
यह बताया गया कि वे अपनी जगह पर पूजा के लिए एक धार्मिक सभा करना चाहते थे, लेकिन राज्य सरकार ने इसके लिए अनुमति मांगने वाले उनके आवेदनों पर कोई कार्रवाई नहीं की।
दलीलों पर विचार करते हुए, कोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा इस टिप्पणी के साथ किया कि याचिकाकर्ताओं को राज्य सरकार से किसी भी अनुमति के बिना अपनी निजी जगह पर अपनी सुविधा के अनुसार प्रार्थना करने का अधिकार है।
कोर्ट ने आगे कहा कि राज्य यह तय कर सकता है कि यदि आवश्यक हो तो ऐसी सुरक्षा किस तरह से प्रदान की जाएगी।
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट मनोज कुमार और अकाल राज सिंह पेश हुए।
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