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सुप्रीम कोर्ट ने CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियो की जांच के लिए पूर्व जज की अध्यक्षता में एक पैनल का गठन किया

कोर्ट ने NEET और अन्य परीक्षाओं के पेपर लीक होने के आरोपों को लेकर जंतर-मंतर, बिहार और देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी कई याचिकाओं पर यह आदेश दिया।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय समिति का गठन किया है।

जस्टिस रेड्डी के अलावा, इस कमेटी में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जस्टिस शलिंदर कौर, CBI के पूर्व डायरेक्टर ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के पूर्व DGP एल.आर. बिश्नोई सदस्य के तौर पर शामिल होंगे।

कमेटी बनाने का आदेश भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने 18 अगस्त को दिया था और इसे गुरुवार, 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर पब्लिश किया गया।

कमेटी को CJP विरोध प्रदर्शनों से जुड़े अलग-अलग पहलुओं पर तथ्यों की जांच करने का काम सौंपा गया है।

कोर्ट ने सिफारिश की है कि HPEC पुलिस की कथित ज्यादतियों, प्रदर्शनकारियों की हिंसा और महिला प्रदर्शनकारियों के उत्पीड़न व छेड़छाड़ के आरोपों की जांच को प्राथमिकता दे।

इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि HPEC दोनों पक्षों (चाहे पुलिसकर्मी हों या प्रदर्शनकारी) में से घायल हुए लोगों को अंतरिम मुआवज़ा देने से जुड़े मुद्दों की भी जांच कर सकता है।

कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ताओं (जो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों को रोकने के लिए गाइडलाइंस चाहते थे) और प्रतिवादी अधिकारियों, दोनों ने HPEC के दायरे पर कई सुझाव दिए थे।

याचिकाकर्ताओं ने पैनल से इन पहलुओं पर गौर करने को कहा:

- प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस द्वारा अत्यधिक बल और हिंसा का इस्तेमाल;

- विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की प्रतिक्रिया का उचित और संयमित होना सुनिश्चित करना;

- प्रदर्शनकारियों के खिलाफ धातु के काइनेटिक प्रोजेक्टाइल या छर्रों (पेलेट्स) के इस्तेमाल पर रोक लगाने की ज़रूरत;

- यह सुनिश्चित करना कि भीड़ को नियंत्रित करने के ऑपरेशन के दौरान पुलिस और सुरक्षाकर्मी सही यूनिफॉर्म पहनें और उनकी नेमप्लेट साफ दिखाई दे;

- और जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों के दौरान निगरानी के आरोपों और महिला प्रदर्शनकारियों को कथित तौर पर निशाना बनाने, उत्पीड़न या दोबारा पीड़ित करने (सेकेंडरी विक्टिमाइजेशन) के आरोपों की जांच;

- पुलिस की ज्यादती के शिकार लोगों को मेडिकल और अन्य ज़रूरी मदद देना, जिसमें मुआवज़ा देना भी शामिल है;

- सार्वजनिक सभाओं पर आम तौर पर हर तरह की रोक (ब्लैंकेट प्रोहिबिशन ऑर्डर) लगाने से बचना।

वहीं, प्रतिवादी अधिकारियों ने कहा कि HPEC को प्रदर्शनकारियों की चिंताओं के साथ-साथ पुलिस द्वारा उठाई गई शिकायतों पर भी गौर करना चाहिए। इन शिकायतों में शामिल हैं:

- पुलिस अधिकारियों और अन्य सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ प्रदर्शनकारियों द्वारा कथित तौर पर बल और हिंसा का इस्तेमाल;

- जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों के दौरान संपत्ति को नुकसान;

- ड्यूटी के दौरान पुलिस बलों को लगी चोटें, और उनके परिवारों को झेलना पड़ा मानसिक और भावनात्मक सदमा। कोर्ट ने कहा कि दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए मुद्दों की जांच HPEC को करनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा, "हमारी राय में, ऊपर बताए गए सभी मुद्दों का विश्लेषण HPEC द्वारा किया जाना चाहिए। इसके लिए उसे पार्टियों द्वारा पेश की गई सामग्री और दलीलों पर उचित विचार करना होगा। HPEC को इससे जुड़े किसी भी अन्य मुद्दे पर विचार करने की भी आज़ादी है, जैसा वह उचित समझे।"

कोर्ट ने आगे कहा कि पैनल का काम सिर्फ़ एक बार की गतिविधि नहीं होगी, बल्कि उठाए गए मुद्दों का लगातार और समय-समय पर मूल्यांकन होगा।

कोर्ट ने कहा, "(HPEC) समय-समय पर अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपेगा ताकि यह कोर्ट उचित कदम उठा सके और ज़रूरी निर्देश जारी कर सके।"

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि विरोध प्रदर्शनों के CCTV फुटेज और पुलिस या सुरक्षा कर्मियों के बॉडी कैम फुटेज, जिन्हें पहले सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया था, उन्हें HPEC को सौंपा जाए।

खास बात यह है कि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ़ समिति की रिपोर्ट से अलग विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

आदेश में कहा गया, "हमारे द्वारा HPEC के गठन से पुलिस अधिकारियों या अन्य सुरक्षा बलों को ऐसे अधिकारियों के खिलाफ़ प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से किसी भी तरह से रोका या मना नहीं किया जाएगा, जो अपने आचरण से जुड़े नियमों का उल्लंघन करते पाए जाते हैं।"

कोर्ट ने यह आदेश NEET और अन्य परीक्षाओं के कथित पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर, बिहार और देश के अन्य हिस्सों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की बर्बरता से जुड़ी कई याचिकाओं पर दिया।

याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से पूरे देश के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग की ताकि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन की अनुमति सुनिश्चित की जा सके।

कुछ याचिकाओं में प्रदर्शन के दौरान पुलिस कर्मियों पर हमला करने के आरोपी प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई की भी मांग की गई थी।

ये विरोध प्रदर्शन जून में CJP के आह्वान पर बार-बार प्रश्न पत्र लीक होने के खिलाफ़ शुरू हुए थे। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की थी, जिन्होंने बाद में इस पद से इस्तीफ़ा दे दिया।

जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के शामिल होने और समर्थन में भूख हड़ताल शुरू करने के बाद विरोध प्रदर्शनों ने ज़ोर पकड़ा। बाद में दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को विरोध स्थल से हटा दिया और उनकी बिगड़ती सेहत का हवाला देते हुए उन्हें अस्पताल ले गई। उन्होंने 23 जुलाई की देर रात मेदांता अस्पताल में अपनी 26 दिन की भूख हड़ताल खत्म की।

इस बीच, खबर है कि 20 जुलाई को संसद की ओर "संसद चलो" मार्च निकाल रहे CJP प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और पैलेट गन का इस्तेमाल किया।

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Supreme Court forms panel headed by former judge to probe police excesses against CJP protestors