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सुप्रीम कोर्ट ने बाल यौन शोषण पीड़िता की निजता का उल्लंघन पर 5 लाख मुआवजे के आदेश को चुनौती वाली TV Today की याचिका खारिज की

बेंच ने मौखिक रूप से कहा कोई मीडिया संस्थान अपने कामकाज की सार्वजनिक प्रकृति से केवल इसलिए पल्ला नहीं झाड़ सकता कि उसे किसी गैर-जिम्मेदाराना प्रसारण के लिए मुआवज़ा देना है या नही यह तय करने का सवाल हो

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने आज 'आज तक' चैनल चलाने वाली कंपनी 'टीवी टुडे' की याचिका खारिज कर दी। इस याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें कंपनी को बच्चे के यौन शोषण की शिकार एक पीड़िता की पहचान उजागर करने वाली जानकारी प्रसारित करके उसकी निजता का उल्लंघन करने के लिए ₹5 लाख का मुआवज़ा देने को कहा गया था [टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड बनाम एबीसी]।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने याचिका खारिज कर दी।

Justice Joymalya Bagchi, CJI Surya Kant and Justice V Mohana

यह मामला 2005 की एक घटना से जुड़ा है, जिसमें एक नाबालिग लड़की ने अपने पिता के खिलाफ़ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज कराई थी।

बताया गया कि जब बच्ची की माँ ने 'आज तक' की टीम को अपनी या अपनी बेटी का इंटरव्यू लेने की इजाज़त देने से मना कर दिया, तब भी चैनल ने एक रिपोर्ट दिखाई। इस रिपोर्ट में पिता का नाम, पद और काम करने की जगह, परिवार की कॉलोनी और घर के विज़ुअल्स और माँ की आवाज़ शामिल थी।

पीड़िता की माँ ने 2005 में चैनल के खिलाफ़ रिट याचिका दायर की थी। 2013 में, एक सिंगल-जज बेंच ने याचिका को मंज़ूरी दी और बच्ची की माँ को ₹5 लाख का मुआवज़ा देने का आदेश दिया।

TV टुडे ने हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने इस आदेश को चुनौती दी। अपील में एक तर्क यह दिया गया कि चैनल एक प्राइवेट संस्था है, इसलिए वह कोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र (writ jurisdiction) के दायरे में नहीं आता है।

1 जुलाई को डिवीज़न बेंच ने इस तर्क को खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि प्राइवेट मीडिया कंपनियाँ भी सार्वजनिक काम करती हैं और अगर वे किसी व्यक्ति की निजता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं, तो वे हाईकोर्ट के रिट अधिकार क्षेत्र के दायरे में आती हैं।

TV टुडे के वकील ने आज इन निष्कर्षों पर सवाल उठाए।

TV टुडे के वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, "कोर्ट का कहना है कि हम सार्वजनिक काम कर रहे हैं, लेकिन यह उन सिद्धांतों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर रहा है जो उसने खुद तय किए थे।"

हालाँकि, कोर्ट ने संकेत दिया कि वह इस सवाल की जाँच करने के पक्ष में नहीं है कि क्या TV टुडे के खिलाफ़ हाई कोर्ट में दायर रिट याचिका सुनवाई योग्य (maintainable) थी या नहीं।

कोर्ट ने कहा, "रिट याचिका के सुनवाई योग्य न होने की आपकी दलील का कोई सवाल ही नहीं उठता।"

जस्टिस बागची ने कहा कि कोई मीडिया आउटलेट अपने कामों की सार्वजनिक प्रकृति से तब पल्ला नहीं झाड़ सकता जब बात गैर-ज़िम्मेदाराना प्रसारण के लिए मुआवज़ा देने की हो।

जज ने पूछा, "आपकी (मीडिया आउटलेट की) तरफ़ से यह बात आनी चाहिए कि आप सार्वजनिक कर्तव्य निभाते हैं। कल अगर आपकी बैंडविड्थ या इंटरनेट तक आपकी पहुँच रोक दी जाए, तो आप यह कहते हुए आएँगे कि मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है क्योंकि लोगों के आर्टिकल 19(1)(a) पर असर पड़ रहा है और प्रेस का गला घोंटा जा रहा है। और जब आप कुछ ऐसा प्रकाशित करते हैं जिसके लिए आप गैर-ज़िम्मेदार हैं और संवैधानिक मुआवज़ा देने का आदेश दिया जाता है, तो आप कहते हैं कि यह सार्वजनिक काम नहीं है?"

TV टुडे के वकील ने आगे दलील दी कि यौन शोषण की शिकार लड़की की माँ ने पिता के साथ मामला सुलझा लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि TV टुडे के खिलाफ आए फैसले के गंभीर नतीजे हो सकते हैं।

TV टुडे के वकील ने आगे चेतावनी दी कि अगर हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा गया, तो ऐसे ही और मामलों की बाढ़ आ जाएगी।

जस्टिस बागची ने जवाब दिया, "हाँ, ऐसा होना चाहिए। हम इसे बढ़ावा देते हैं।"

इसके बाद कोर्ट ने TV टुडे की अपील खारिज कर दी।

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Supreme Court rejects TV Today's challenge to ₹5 lakh compensation for violating child sexual abuse victim's privacy