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न्यायिक सेवा मे 3 वर्ष की वकालत की अनिवार्यता नियम के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओ पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) की भर्ती के लिए बार में कम से कम तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त रखने वाले कोर्ट के पिछले फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई थीं।

Bar & Bench

सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई को उन पुनर्विचार याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया, जिनमें न्यायिक सेवा में शामिल होने के लिए तीन साल की कानूनी प्रैक्टिस की शर्त वाले उसके पहले के आदेश को चुनौती दी गई थी।

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और के. विनोद चंद्रन की बेंच ने पहले रिव्यू याचिकाओं पर नोटिस जारी किया था और उन्हें खुली अदालत में सुनने की अनुमति दी थी।

इन रिव्यू याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें कहा गया था कि सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) परीक्षा में शामिल होने के लिए उम्मीदवारों का वकील के तौर पर कम से कम तीन साल का अनुभव होना ज़रूरी है।

CJI Surya Kant, Justice Augustine George Masih and Justice K Vinod Chandran

20 मई, 2025 के अपने फ़ैसले में, कोर्ट ने साफ़ किया था कि तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त भविष्य में लागू होगी और फ़ैसले की तारीख से पहले शुरू हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रैक्टिस की अवधि प्रोविज़नल एनरोलमेंट (अस्थायी पंजीकरण) की तारीख से गिनी जाएगी और निर्देश दिया कि चुने गए उम्मीदवारों को कोर्ट में काम संभालने से पहले कम से कम एक साल की ट्रेनिंग लेनी होगी।

तत्कालीन CJI बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह और के. विनोद चंद्रन की बेंच ने सभी हाई कोर्ट और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वे इस शर्त को शामिल करने के लिए अपने सर्विस नियमों में बदलाव करें।

इस फ़ैसले के बाद, इस निर्देश को चुनौती देते हुए कई रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिकाएं) दायर की गईं।

सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने कई आधारों पर फ़ैसले को चुनौती देते हुए एक रिव्यू पिटीशन दायर की।

याचिका में 1924 और 1986 के बीच जारी लॉ कमीशन की रिपोर्ट का ज़िक्र किया गया, जिसमें ज्यूडिशियरी (न्यायपालिका) में एंट्री के लिए बार में पहले से प्रैक्टिस करने की शर्त को अनिवार्य बनाने का विरोध किया गया था। इसमें दूसरे ज्यूडिशियल पे कमीशन की रिपोर्ट (2022) का भी हवाला दिया गया, जिसमें सुझाव दिया गया था कि ऐसी कोई भी योग्यता शर्त व्यापक विचार-विमर्श प्रक्रिया के बाद ही लागू की जानी चाहिए।

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि क्या नई शर्त लाने से पहले राज्य ज्यूडिशियल अकादमियों में मौजूदा ट्रेनिंग सिस्टम पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था।

एडवोकेट चंद्र सेन यादव ने भी एक याचिका दायर कर तर्क दिया कि यह शर्त संविधान के आर्टिकल 14 और 16 (जो कानूनी समानता और सरकारी नौकरी में समान अवसर की गारंटी देते हैं) का उल्लंघन करती है।

याचिका में नियम को लागू करने में देरी की मांग की गई और तर्क दिया गया कि हाल ही में लॉ ग्रेजुएट हुए उन लोगों को बाहर नहीं किया जाना चाहिए जिन्होंने पुरानी योग्यता शर्तों के तहत तैयारी की थी।

रिव्यू पिटीशन में इस बात पर भी चिंता जताई गई कि यह शर्त आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों और सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों के उम्मीदवारों को कैसे प्रभावित कर सकती है। इसमें सवाल उठाया गया कि क्या तीन साल की प्रैक्टिस को अनिवार्य बनाने को सही ठहराने के लिए पर्याप्त ठोस डेटा मौजूद था।

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Bhumika_Trust_v__Union_of_India___Ors__.pdf
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Supreme Court reserves verdict in review petitions against 3-year law practice rule for judicial service