सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश पर आंशिक रूप से रोक लगा दी, जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में ग्रेजुएट आकृति चौधरी को नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत में लेने का आदेश देने के लिए गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम को फटकार लगाई गई थी [मेधा रूपम बनाम आकृति चौधरी और अन्य]।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और एन.के. सिंह की बेंच ने हाई कोर्ट के उस आदेश पर भी रोक लगा दी, जिसमें रूपम को अपनी सैलरी से चौधरी को ₹5 लाख का मुआवज़ा देने के लिए कहा गया था।
यह मामला अप्रैल में नोएडा में हुए इंडस्ट्रियल वर्कर्स के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में छात्रा आकृति चौधरी की हिरासत से जुड़ा है।
2 सितंबर को, इलाहाबाद हाई कोर्ट की जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीज़न बेंच ने NSA के तहत चौधरी की हिरासत को रद्द कर दिया था और उन्हें मुआवज़े के तौर पर ₹5 लाख देने का आदेश दिया था।
यह रकम डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की सैलरी और उन सभी अधिकारियों से वसूलने का आदेश दिया गया था जो NSA के तहत चौधरी की हिरासत की वजह बनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए ज़िम्मेदार थे।
हाई कोर्ट ने कहा था कि जब चौधरी के ख़िलाफ़ पुलिस रिपोर्ट में कोई भरोसेमंद सबूत नहीं था, तो अधिकारी से उम्मीद की जाती थी कि वह NSA के "दमनकारी प्रावधानों" का इस्तेमाल करने से पहले सतर्क रहे और रिकॉर्ड की बारीकी से जांच करे। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में रूपम का व्यवहार निंदनीय था।
इसी फ़ैसले में, हाई कोर्ट ने इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस (IAS) और इंडियन पुलिस सर्विस (IPS) के अधिकारियों को यह भी याद दिलाया कि उनकी वफ़ादारी संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति।
कोर्ट ने कहा कि जब भी नौकरशाह और पुलिस वाले भारत और उसके संविधान के प्रति अपनी शपथ और निष्ठा को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो लोग उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी निशानी के तौर पर देखते हैं।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर वह नौकरशाहों की मनमानी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में नाकाम रहता है, तो राज्य एक 'ऑर्वेलियन डिस्टोपिया' (एक ऐसा समाज जहाँ सरकार का पूरा नियंत्रण हो और लोगों की आज़ादी न हो) में बदल सकता है।
इन टिप्पणियों के साथ, हाई कोर्ट ने NSA के तहत चौधरी की हिरासत को रद्द कर दिया था।
रूपम ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसने इस पर रोक लगा दी।
आज लगी रोक के साथ, सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 7 अक्टूबर की तारीख तय की है।
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