दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में चेतावनी दी है कि किसी महिला के कपड़ों की पसंद का हवाला देकर उसके साथ हुए यौन उत्पीड़न को सही नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने एक 17 साल की लड़की के साथ यौन उत्पीड़न करने के आरोप में एक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए यह टिप्पणी की।
खास बात यह है कि जज ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि आरोपी और पचास स्थानीय निवासियों द्वारा पीड़िता और उसकी माँ के खिलाफ की गई शिकायतों की पुलिस द्वारा जांच न करना, आरोपी के बरी होने की एक वजह थी।
जस्टिस सुधा यह देखकर हैरान रह गईं कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता और उसकी माँ का कथित "अपराध" यह था कि वे बिना किसी पुरुष सदस्य के समाज में रह रही थीं, पश्चिमी कपड़े पहनती थीं, इलाके के युवा लड़कों के दिमाग को "खराब" कर रही थीं, उनका चरित्र संदिग्ध था और वे इलाके के "बेगुनाह लड़कों" के खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज करा रही थीं।
अदालत ने कहा कि ये "शिकायतें" एक बेहद चिंताजनक और अस्वीकार्य सोच को दर्शाती हैं।
कोई लड़की या महिला क्या पहनती है, यह उसकी अपनी पसंद है। यह सुझाव कि जींस पहनने वाली महिला 'युवा लड़कों को बिगाड़ सकती है', एक बेहद चिंताजनक और अस्वीकार्य सोच को दर्शाता है।दिल्ली उच्च न्यायालय
यह घटना 2013 की है। कहा जाता है कि साजिद नाम के एक व्यक्ति ने एक किशोरी का लगातार पीछा किया, उसे रोका, उसके बारे में यौन प्रकृति की टिप्पणियां कीं और उसे गलत तरीके से छुआ।
ट्रायल कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 354A (महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाना) और बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO एक्ट) के तहत साजिद पर आरोप तय किए। हालांकि, अभियोजन पक्ष के मामले में विसंगतियों के कारण ट्रायल कोर्ट ने 2014 में साजिद को बरी कर दिया। इसके बाद दिल्ली सरकार ने बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की।
10 अगस्त के अपने फैसले में, हाईकोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि आरोपी व्यक्ति का रवैया ऐसा था कि उसे पीड़िता को मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करने का पूरा अधिकार है, क्योंकि उसके पहनावे और आचरण के कारण वह "आसान चरित्र" (easy virtue) वाली महिला थी।
कोर्ट ने इस सोच की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि "आसान चरित्र" वाली महिलाओं को भी निजता और सुरक्षा का अधिकार है।
"यहां तक कि 'आसान चरित्र' वाली महिला को भी निजता का अधिकार है और कोई भी व्यक्ति जब चाहे उसकी निजता का उल्लंघन नहीं कर सकता। इसी तरह, कोई भी व्यक्ति जब चाहे उसके शरीर का उल्लंघन नहीं कर सकता। यदि उसकी इच्छा के विरुद्ध उसके शरीर का उल्लंघन करने का प्रयास किया जाता है, तो उसे अपने शरीर की रक्षा करने का अधिकार है। उसे भी कानून का संरक्षण पाने का समान अधिकार है।"
यहाँ तक कि आसान चरित्र वाली महिला को भी निजता का अधिकार है और कोई भी जब चाहे उसकी निजता में दखल नहीं दे सकता।दिल्ली उच्च न्यायालय
कोर्ट ने शिकायतकर्ता महिला से जिरह (cross-examination) के दौरान बचाव पक्ष के वकील के सवालों के तरीके की भी आलोचना की। कोर्ट ने पाया कि ये सवाल महिला के कपड़ों के आधार पर उसे नीचा दिखाने और उसके चरित्र पर सवाल उठाने के मकसद से पूछे गए थे।
कोर्ट ने कहा, "महिला के कपड़ों का चुनाव न तो उसकी गरिमा को कम करता है और न ही उसके खिलाफ गैर-कानूनी व्यवहार को सही ठहराने या उसे माफ करने का आधार बनता है। महिला को कैसे कपड़े पहनने चाहिए, इस बारे में पुरानी सोच पर आधारित सवालों की अदालत में कोई जगह नहीं है। ऐसे सवालों को चरित्र हनन या शिकायतकर्ता को दोषी ठहराने का ज़रिया नहीं बनने दिया जा सकता।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि बचाव पक्ष के वकील ने महिला के कपड़ों के चुनाव पर सवाल उठाते हुए उसके और पड़ोस में रहने वाले लोगों के धर्म का भी ज़िक्र किया था। कोर्ट ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न के मामले में धर्म को बीच में लाने की कोई ज़रूरत नहीं थी।
कोर्ट ने कहा, "उसका धर्म, इलाके के लोगों का धर्म और उसके पहने हुए कपड़ों का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। न तो धर्म और न ही स्थानीय रीति-रिवाजों का इस्तेमाल गैर-कानूनी व्यवहार को सही ठहराने या महिला की निजी पसंद पर पाबंदी लगाने के लिए किया जा सकता है। मामले में (शिकायतकर्ता) के धर्म और कपड़ों को बीच में लाने की कोशिश पूरी तरह से अप्रासंगिक और अनुचित थी।"
कोर्ट ने कहा कि कोई वकील जिरह का इस्तेमाल गवाह को नीचा दिखाने या महिला की गरिमा पर हमला करने के लिए लाइसेंस की तरह नहीं कर सकता। कोर्ट ने बचाव पक्ष के इस रवैये की भी आलोचना की। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को बचाव पक्ष के ऐसे अपमानजनक सवालों को अनुमति नहीं देनी चाहिए थी।
कोर्ट ने कहा, "जब भी जिरह प्रासंगिकता और मर्यादा की सीमा पार करती है, या गवाह को डराने, अपमानित करने, परेशान करने या शर्मिंदा करने के लिए इस्तेमाल की जाती है, तो कोर्ट को तुरंत और सख्ती से दखल देना चाहिए। जिरह की प्रक्रिया को अपमान का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता और न ही गवाह की विश्वसनीयता की जांच के नाम पर उसकी गरिमा की बलि दी जा सकती है।"
कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों को कड़ी चेतावनी दी कि वे महिला के कपड़ों, उसके चरित्र, जीवनशैली, धर्म या निजी पसंद से जुड़े सवालों पर विचार न करें। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों की शिकार महिलाओं के लिए अदालतों को सदमे और उत्पीड़न की दूसरी जगह नहीं बनने दिया जा सकता।
कोर्ट ने आगे कहा, "यह ज़िम्मेदारी तब और भी अहम हो जाती है जब गवाह कोई बच्चा हो, यौन अपराध का शिकार हो या किसी कमज़ोर स्थिति में हो।"
कोर्ट ने दिल्ली ज्यूडिशियल एकेडमी को भी यह फ़ैसला भेजने का निर्देश दिया, ताकि ट्रेनिंग और संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कार्यक्रम आयोजित किए जा सकें।
कोर्ट ने मामले के तथ्यों के आधार पर साजिद को दोषी ठहराया और कहा कि सज़ा पर फ़ैसला 12 अगस्त को सुनाया जाएगा।
दिल्ली सरकार की ओर से पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उत्कर्ष पेश हुए।
आरोपी की ओर से वकील मोहम्मद इक़बाल और कंवर फ़ैसल पेश हुए।
[फ़ैसला पढ़ें]
और अधिक पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें